T ( ५१ ) थागो-नहीं सहकारीजी अभी नहीं, अभी इस भी नहीं बजे है । हमारे सेनाधिपति ने देशदामिनी के प्रेमके हेतु हमें अभी से धक्के देदिये हैं। इसमें उनका कुछ अपराध नहीं है, उन्होंने अभीतक रात्रि में उसके साथ काम कलोल नहीं किया है। वह तो इन्द्र के रमण योग्य है ! केसियो - वह अत्यन्त विशिष्ठ श्रीमती है । यागो - और मैं इस बातका बीड़ा उठा सकता हूं कि वह कला कौतुक पूर्ण है । केसियो सचमुच उसका खिलता योवन है और वह बड़ी सुकुमार है । यागो - पहा ! उसके क्याही मनोहर नयन हैं मानो शशुओं से भी सम्मिलन करने के लिये घोषणा करते हैं। केलियो- हां ! वे लुभाते तो हैं तौभी में सोचता हूं कि उनमें यथोचित लज्जा भी है। यागो और सचमुच जब वह बोलती है तो मानो कामदेव का आह्वान करती है। केलियो - निःसन्देह वह सद्गुणों से परिपूर्ण है । यागो-ठीक है, उनके कामकलोल मंगलमय हों । आइये सहकारीजी मेरे पास एक मटकी मदिरा की है और बाहर साइप्रस के दो चीर खड़े हैं, उनकी इच्छा है कि कृष्ण ओथेलो महाशय की आरोग्यता के लिये एक २ पात्र चढावें । .के सियो- नहीं भाई यागो आज रात नहीं, थोड़े से सुरापान से ही मेरा मस्तिष्क चक्कर खाने लगता है, मेरो तो यह अनुमति है कि शिष्टाचार के लिये सत्कार की कोई स्पौर मथा निकाली जाय तो अच्छा हो ।
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