(७३) यमिलिया । सुशील श्रीमती, व्यवश्य ऐसा कीजिये। मैं बीटा उठाकर कह सकती हूँ कि मेरे स्वामी को इस बातका इतना शोक है कि मानो यह भापति उन्हीं पर पड़ी है। देशदामिनी । हाँ वह एक सचरित्र व्यक्ति है । केसियो । तुम इसवात से निःशंक रहो कि मैं तुम्हारे और अपने स्वामी के बीच में फिर पेसी मैत्री करा दूंगी कि जैसी पहिले थी । केलियो । उदार श्रीमती जी, चाहे मैकल केसियोकी कुछ भी दशाहो, वह सर्वदा आपका सच्चा सेवक बना रहेगा । देशदामिनी । मैं इस बातको जानती हूं और इसके लिये तुम्हारा धन्यवाद करती हूं। तुम मेरे प्राणपति को प्यार करते हो, तुम उनको बहुत दिनों से जानते हो, इसलिये तुम इसबात को निश्चय समझो कि मैं ऐसा यत्न करूंगी कि जिससे जितना राज नीति विचारों से उचित है उससे अधिक कालतक वह तुम्हारे साथ विदेशीभाव नहीं रक्खेंगे । केसियो । श्रीमतीजी, यह बात ठीक है. पर कौन जानता है कि वह राजनीति के विचार उनके मनमें इतने दीर्घकाल तक खटकते रहें या किन्हीं एसी काल्पनिक और प्रसार घटनाओंों से वे ऐसे पुष्ट हो जायें या प्रावश्यकता से इतना अधिक बढ़जायें कि मेरी अनुपस्थि- ति में अब मेरे पदपर कोई अन्यव्यक्ति नियुक्त होजायगा तो सेना पति महाशय मेरे प्रेम और सेवाको भूल जायेंगे । देशदामिनी । इसकी शंका मतकरो, मैं यहां यमिलिया के सामने तुमको वचन देती हूं कि तुम्हारा पद तुमको मिल जायगा । इस बातको निश्चय समझो कि जब मैं मैत्रीका प्रण करती हूं, तो उसको सौंगोपांग पूरा निमाये बिना नहीं रहसकती। मैं अपने स्वामी को चैन नहीं होने दूँगी, उनको तब तक सोने नहीं देतो SHRAD
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