पृष्ठ:कंकाल.pdf/१८८

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अब मोहन वैः लिए उसबै मन में उतनी व्यना न । मोहन भी श्रीचन्द्र को बाबूजी वहने लगा था । बहु मुख में पलने लगा। किशोरी गरिबात के पास बैठी हुई अपनी अतीत-चिन्ता में निमग्न थी । नन्द के साथ पगड़ी स्नान करके तौट आई थी। नादर उतारते हुए नन्दी में पगली र केही–बेटी ! उसने कहा माँ ! तुमको राय किस नाम से पुकारते थे, यह तो मैंने आज तक न पुछा । बतनाथो बेटी बहु प्यारा नाम ! मां, मुझे मामाइन 'घण्टी' नाम से बुलाती थी। नांदी के भुरोलो घण्टी-सी ही तेरी बोली है बेटी ! किशोरी गुन रही थी। उसने पास आकर एवः बार आंव गडा पर देखा और पुछा—लगा कहा ! घण्टी ? | हाँ बहुजी वही वृन्दावाली ग्टी । | विघ्नो आग हो गई। वह भभक उठी–निकल जा ढापन ! मेरे विजय को या डालने वाली चुड़े न ! नन्दो शो पहले एक वार किशोरी की दर गर तब्ध रही; पर वह व महनथाली ! इसने हाह संभालकर बातें करो थy ! में भिसी से दबनेवाली नहीं। मेरे सामने किराफा बाइस हैं, जो मेरी बेटी-मेरी घण्टी–को आंन्द्र दिया ! आज निवाल हूँ ! सुम-दोनो अभी निकल आओ--अर्ध जाओ, नहीं तो नौकरी में पत्रके देकर निकलवा देंगी ।-हांफती हुई पिशोरी ने कहा ।। | दर इतना ही तो गौरी , अपना मृग ने ! हग डाग जाती है, मेरे कृपये अभी दिलवा दो, बस अब एक शब्द भी मुंह से न निकालना-रामा ! भन्दो ने तीयेपन से यहा । । किशोरी झोध में उठी और ज्ञानमारी रखोलनर नोटों को बण्डले उनीः सामने फेंकती हुई यौलो–तो सहुजो अपना रुपमा, भागो ! नदी में प्रपदी से वाद्दा- बेटी ! अपना सामान ले लो। दोनों ने तुरन्त गठरी इदागर बाहर की राह ली। किशोरी ने एक बार भो जन्हें ठहरने के लिए ने कहा। उस समय श्रीचन्द्र और गहुन गाड़ी पर पर वा प्रान गये थे। किणारी अन हुदय इस नवागन्तुक कल्पित मान से विद्रोह तो कर ही रहा पा, बहू अपना गुच्चा घर जाकर इस दत्तक पुत्र से गन शुनवाने में असमर्थ पति : १७