पृष्ठ:कंकाल.pdf/२३५

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श्रीचन्द्र ने कहा-गलौ, क्या करेगी ? वह दौड़ी हुई बिजय के पारा गई। उसने बड़े होकर उसे देग, फिर पास बैठ्यार देखा। दोनों आँखों से अभूि की धारा बह चली। यमुना, सुर बहे श्रीचन्द्र के पास नाई। बोली-~-वैश्यूजीं, गैरे वेतन में है। काट लेना, इसी समय दीजिए, मैं जन्म-भर यह ऋण मरूंगी। है क्या, में भी मु । श्रीचन्द्र ने गा मेरा एक भाई थी, गही भीख माँगता था बाद् ! आज मरा फ्धा है, उसका संस्कार तो करा दें। यह रो रही थी । माहुन ने नही–दाई रोती है बागी, और तुम दस-ठो रुपये नहीं देते ।। थप नै दस का नोट निकाल कर दिया। यमुना प्रसन्नता से बोलीमेरी भी आयु लेकर जियो मेरे सात ! वह शन में पास चल पडी; भरनु उस संस्कार के लिए कुछ सोग भी चाहिए, मैं वहाँ से आई । यमुना मुँह फिरार चुपचाप घट्टी यौ । घण्टी चारों शोर देखती हुई फिर वही आई। इसके साथ चार रुपयनैव ये 1 स्वयंसेवकों ने पूछा-चही न देवीजी ? हामझकर घण्टी ने देखा कि एक स्त्री पट काढे, दस रुपये का नोट स्वयंसेवक के हाथ में दे री है। घन्ट्री ने कहा-दान है इस पुण्यभागिनी काले लो, जकिर इससे सामान लावर मृतक-मुंस्कार करण्या दो। स्वयंसेवक ने उसे में लिया । वह जी नही जै यी । इतने में मंगलवेब कै साथ गाना भी आई । मंगल ने कहा-घण्ट्री ! मैं तुम्हारा इस तत्परता से बों प्रसन्न हुआ। अच्छा अब लो, अभी बहुत-या याम बाकी हैं। मनुष्य के हिरो-हित में काम की तो बाकी पड़े गिते हैं—कर घंटी ५ोचने सभी 1 फिर उस शयं को यौन देशा मंगल को खेत से दिलाई। मंगल ने देखा-एक स्त्री यारा की मलिन बसन में बैठी है। उसका हट आँसुओं से भीग गया है। और निराश्रय पा है, एक :-- कंकाल