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कर्बला

साद---बनी और असद ही नहीं, अगर इराक़ के सारे क़बीले अा जायँ, तब भी हम आज उन्हें जंग के लिए मजबूर नहीं कर सकते। यह इन्सानियत के खिलाफ़ है। मेरा यही फ़ैसला है। आइन्दा आप लोगों को अख्तियार है।

[ साद गुस्से में भरा हुआ वहाँ से चला जाता है। ]

शिमर---क्या आप लोगों की यही मर्ज़ी है कि आज जंग मुल्तवी की जाय?

हुर---यहाँ जितने असहाब मौजूद हैं, सब अपनी रायें दे चुके, अमीरे-लश्कर भी चला गया। ऐसी हालत में मुहलत के सिवा और हो ही क्या सकता है। अगर आप अपनी जिम्मेदारी पर जंग करना चाहते हैं, तो शौक़ से कीजिए।

[ हुर, हज्जाज वग़ैरह भी चले जाते हैं। ]

शिमर---( दिल में ) कौन कहता है कि हुसैन के साथ दग़ा की गयी? यहाँ सब-के-सब हुसैन के दोस्त हैं। इस फ़ौज में रहने से कहीं यह बेहतर था कि सब-के-सब हुसैन की फ़ौज में होते। तब भी उनकी इतनी मदद न कर सकते। मुझे जरा भी ताज्जुब न होगा, अगर कल सब लोग हथियार रखकर हुसैन के क़दमों पर गिर पड़ें। ज़ियाद को इस मुहलत की भी इत्तिला तो दे ही हूँ।

[ साद का क़ासिद मुहलत का पैग़ाम लेकर हुसैन के लश्कर की तरफ़ आता है। शिमर अपने ख़ेमे की तरफ़ जाता है। ]


सातवाँ दृश्य

[ समय ८ बजे रात। हुसैन एक कुर्सी पर मैदान में बैठे हुए हैं। उनके दोस्त और अज़ीज़ सब फ़र्श पर बैठे हुए हैं। शमा जल रही है। ]

हुसन---शुक्र है खुदाए-पाक का, जिसने हमें ईमान की रोशनी अता की, ताकि हम नेक को क़बूल करें, और बद से बचें। मेरे सामने इस वक्त मेरे बेटे और भतीजे, भाई और भांजे, दोस्त और रफ़ीक़, सब जमा हैं। मैं