पृष्ठ:कर्बला.djvu/१८३

विकिस्रोत से
नेविगेशन पर जाएँ खोज पर जाएँ
यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।
१८३
कर्बला

के दिन तुम्हीं इसके ज़िम्मेदार होगे।

कीस---रोको अपने आदमियों को।

शिमर---मैं अपने फ़ैल का मुख़्तार हूँ। आग बरसाओ, लगा दो आग।

शीस---साद, खुदा को क्या मुँह दिखाओगे?

हबीब---दोस्त, टूट पड़ो शिमर पर, बाज की तरह टूट पड़ो। नामूसे-हुसैन पर निसार हो जाओ। एकबारगी नेजों का वार करो।

[ हबीब और उनके साथ दस आदमी नेज़े लेकर शिमर पर टूट पड़ते हैं। शिमर भागता है, और उसकी फ़ौज भी भाग जाती है। ]

हुसैन---हबीब, तुमने अाज अहलेबैत की आबरू रख ली। खुदा तुम्हें इसकी जज़ा दे।

हबीब---या मौला, दुश्मन दो-चार लहमों के लिए हट गया है, नमाज़ का वक्त आ गया है, हमारी तमन्ना है कि आपके साथ आख़िरी नमाज़ पढ़ लें। शायद फिर यह मौक़ा न मिले।

हुसैन---खुदा तुम पर रहम करे, अजान दो। ऐ साद, क्या तू इस्लाम की शरियत को भी भूल गया? क्या इतनी मुहलत न देगा कि नमाज़ पढ़ कर जंग की जाय?

शिमर---ख़ुदा पाक की क़सम, हर्गिज नहीं। तुम बेनमाज़ क़त्ल किये जाअोगे। शरियत बाग़ियों के लिए नहीं है।

हबीब---या मौला, अाप नमाज अदा फ़रमायें, इस मूज़ी को बकने दें। इसकी इतनी मजाल नहीं है कि नमाज में मुख़िल हो।

[ लोग नमाज पढ़ने लगते हैं। साहसराय और उनके सातो भाई हुसैन की पुश्त पर खड़े शिमर के तीरों से उनको बचाते रहते हैं। नमाज़ खत्म हो जाती है। ]

हुसैन---दोस्तो, मेरे प्यारे ग़मगुसारो, यह नमाज़ इस्लाम की तारीख़ मे यादगार रहेगी। अगर ख़ुदा के इन दिलेर बन्दों ने, हमारे पुश्त पर खड़े होकर, हमें दुश्मनों के तीरों से न बचाया होता, तो हमारी नमाज़ हर्गिज़ न पूरी होती। ऐ हक़परस्तो, हम तुम्हें सलाम करते हैं। अगर्चे तुम मोमिन नहीं हो, लेकिन जिस मजहब के पैरों ऐसे हक़परवर, ऐसे इन्साफ़ पर जान