पृष्ठ:कर्मभूमि.pdf/२०८

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कम हो गयी थी। मधुसूदनजी ने बहुत चाहा, कि रंग जमा दें; पर लोग जम्हाइयाँ ले रहे थे और पिछली सफ़ों में तो लोग बड़ल्ले से सो रहे थे। मालूम होता था, मन्दिर का आंगन कुछ छोटा हो गया है, दरवाजे कुछ नीचे हो गये हैं। भजनमंडली के न होने से और भी सन्नाटा है। उधर नौजवान सभा के सामने खुले मैदान में शांतिकुमार की कथा हो रही थी। ब्रजनाथ, सलीम, आत्मानन्द आदि आनेवालों का स्वागत करते थे। थोडी देर में दरियां छोटी पड़ गयीं और थोड़ी देर और गुजरने पर मैदान भी छोटा पड़ गया। अधिकांश लोग नंगे बदन थे, कुछ लोग चीथड़े पहने हुए। उनकी देह से तम्बाकू और मैलेपन की दुर्गन्ध आ रही थी। स्त्रियाँ आभूषणहीन, मैली-कूचेैली धोतियां या लहँगे पहने हए थीं। रेशम और सुगन्ध और चमकीले आभूषणों का कहीं नाम न था; पर हृदयों में दया थी, धर्म था, सेवा-भाव था, त्याग था। नये आनेवालों को देखते ही लोग जगह घेरने को पाँव न फैला लेते थे, यों न ताकते थे, जैसे कोई शत्रु आ गया हो; बल्कि और सिमट जाते थे और खुशी से जगह दे देते थे।

नौ बजे कथा आरम्भ हुई। यह देवी-देवताओं और अवतारों की कथा न थी, ब्रह्म-ऋषियों के तप और तेज का वृत्तान्त न था, क्षत्रियों के शौर्य और दान की गाथा न थी। यह उस पुरुष का पावन चरित्र था, जिसके यहाँ मन और कर्म की शुद्धता ही धर्म का मूल तत्त्व है। वही ऊँचा है, जिसका मन शुद्ध है। वही नीचा है, जिसका मन अशुद्ध है; जिसने वर्ण का स्वाँग रचकर समाज के एक अंग को मदान्ध और दूसरे को म्लेच्छ नहीं बनाया; किसी के लिए उन्नति या उद्धार का द्वार नहीं बन्द किया; एक के माथे पर बड़प्पन का तिलक और दूसरे के माथे पर नीचता का कलंक नहीं लगाया। इस चरित्र में आत्मोन्नति का एक सजीव सन्देश था, जिसे सुनकर दर्शकों को ऐसा प्रतीत होता था, मानो उनकी आत्मा के बन्धन खुल गये हैं, संसार पवित्र और सुन्दर हो गया है।

नैना को भी धर्म के पाखण्ड से चिढ़ थी। अमरकान्त उससे इस विषय पर अकसर बातें किया करता था। अछूतों पर यह अत्याचार देखकर उसका खून भी खौल उठा था। समरकान्त का भय न होता, तो उसने ब्रह्माचारीजी को फटकार बतायी होती; इसलिए जब शान्तिकुमार ने तिलकधारियों को आड़े

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कर्मभूमि