पृष्ठ:कर्मभूमि.pdf/२१२

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बड़े धर्मात्मा बने हो? आधी रात तक इसी मन्दिर में जुआ खेलते हो, पैसे-पैसे पर ईमान बेचते हो, झूठी गवाहियाँ देते हो, द्वार-द्वार भीख माँगते हो, फिर भी तुम धर्म के ठीकेदार हो? तुम्हारे तो स्पर्श से ही देवताओं को कलंक लगता है।

वह मन के इस आग्रह को रोक न सकी? पीछे से भीड़ को चीरती हई मंदिर के द्वार को चली आ रही थी कि शांतिकुमार की निगाह उस पर पड़ गयी। चौंककर बोले--तुम यहाँ कहाँ नैना? मैंने तो समझा था, तुम अन्दर कथा सुन रही होगी।

नैना ने बनावटी रोष से कहा--आपने तो रास्ता रोक रखा है। कैसे जाऊँ?

शांतिकुमार ने भीड़ को सामने से हटाते हुए कहा--मुझे मालूम न था कि तुम रुकी खड़ी हो।

नैना ने ज़रा ठिठक कर कहा--आप हमारे ठाकुरजी को भ्रष्ट करना चाहते हैं ?

शांतिकुमार उसका विनोद न समझ सके। उदास होकर बोले--क्या तुम्हारा भी यही विचार है नैना?

नैना ने और रद्दा जमाया--आप अछूतों को मन्दिर में भर देंगे तो देवता भ्रष्ट न होंगे?

शांतिकुमार ने गंभीर भाव से कहा--मैंने तो समझा था, देवता भ्रष्टों को पवित्र करते हैं, खुद भ्रष्ट नहीं होते।

सहसा ब्रह्मचारी ने गरजकर कहा--तुम लोग क्या यहाँ बलवा करने आये हो, ठाकुरजी के मंदिर के द्वार पर?

एक आदमी ने आगे बढ़कर कहा--हम फ़ौजदारी करने नहीं आये हैं, ठाकुरजी के दर्शन करने आये हैं।

समरकान्त ने उस आदमी को धक्का देकर कहा--तुम्हारे बाप-दादा भी कभी दर्शन करने आये थे कि तुम्हीं सब से वीर हो!

शांतिकुमार ने उस आदमी को सँभालकर कहा--बाप-दादों ने जो काम नहीं किया, क्या वह पोतों-परपोतों के लिये भी वर्जित है लालाजी ? बाप-दादे तो बिजली और तार का नाम तक नहीं जानते थे, फिर आज इन

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