पृष्ठ:कर्मभूमि.pdf/२५२

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ प्रमाणित हो गया।



चाहते थे, वही मैं भी उनसे चाहती थी। जो चीज वह मुझे न दे सके, वह मुझसे न पाकर वह क्यों उद्दण्ड हो गये? क्या इसीलिए कि वह पुरुष हैं, और चाहे स्त्री को पाँव को जुती समझें पर स्त्री का धर्म है कि वह उनके पाँव से लिपटी रहे? बहन, जिस तरह तुमने मुझसे कोई परदा नहीं रखा, उसी तरह मैं भी तुमसे निष्कपट बातें कर रही हूँ। मेरी जगह पर एक क्षण के लिए अपने को रख लो। तब तुम मेरे भावों को पहचान सकोगी। अगर मेरी खता है तो उतनी ही उनकी भी खता है। जिस तरह मैं अपनी तकदीर को ठोंककर बैठ गयी थी; क्या वह भी न बैठ सकते थे। तब शायद सफ़ाई हो जाती। लेकिन अब तो जब तक उनकी तरफ़ से हाथ न बढ़ाया जायगा, मैं अपना हाथ नहीं बढ़ा सकती, चाहे सारी जिन्दगी इसी दशा में पड़ी रहूँ। औरत निर्बल हैं और इसीलिए उसे मान-अपमान का दुःख भी ज्यादा होता है। अब मुझे आज्ञा दो बहन, जरा नैना से मिलना है। मैं तुम्हारे लिए सवारी भेजूंगी, कृपा करके कभी-कभी हमारे यहाँ आ जाया करो।

वह कमरे से बाहर निकली, तो सकीना रो रही थी, न जाने क्यों।


१०

सुखदा सेठ धनीराम के घर पहुँची, तो नौ बज रहे थे। बड़ा विशाल, आसमान से बातें करनेवाला भवन था, जिसके द्वार पर एक तेज बिजली की बत्ती जल रही थी और दो दरबान खड़े थे। सुखदा को देखते ही भीतर-बाहर हलचल मच गयी। लाला मनीराम घर से निकल आये और उसे अन्दर ले गये। दूसरी मंजिल पर सजा हआ मलाक़ाती कमरा था। सुखदा वहाँ बैठायी गयी। घर की स्त्रियाँ इधर-उधर परदों से उसे झाँक रही थीं; कमरे में आने का साहस न कर सकती थीं।

सुखदा ने एक कोच पर बैठकर पूछा--सब कुशल-मंगल है?

मनीराम ने एक सिगार सुलगाकर धुआँ उड़ाते हुए कहा--आपने शायद पेपर नहीं देखा। पापा को दो दिन से ज्वर आ रहा है। मैंने तो कलकत्ता से मि० लैंसेट को बुला लिया है। यहाँ किसी पर मुझे विश्वास

२५२
कर्मभूमि