पृष्ठ:कर्मभूमि.pdf/२५९

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यह कहकर उन्होंने लकड़ी उठाई और धीरे-धीरे अपने कमरे की तरफ़ चले। मनीराम उन्हें दोनों हाथों से संँभाले हुए था।


११

सावन में नैना मैके आई। ससुराल चार कदम पर थी, पर छ: महीने से पहले आने का अवसर न मिला। मनीराम का बस होता, तो अब भी न आने देता; लेकिन सारा घर नैना की तरफ़ था। सावन में सभी बहुएँ मैके जाती हैं। नैना पर इतना बड़ा अत्याचार नहीं किया जा सकता।

सावन की झड़ी लगी हुई थी। कहीं कोई मकान गिरता था, कहीं कोई छत बैठती थी। सुखदा बरामदे में बैठो हुई आँगन में उठते हुए बुलबुलों की सैर कर रही थी। आँगन कुछ गहरा था, पानी रुक जाया करता था। बुलबुलों का बताशों की तरह उठकर कुछ दूर चला जाना और गायब हो जाना उसके लिए मनोरंजक तमाशा बना हुआ था। कभी-कभी दो बुलबुले आमने-सामने आ जाते और जैसे हम कभी-कभी किसी के सामने आने पर कतराकर निकल जाना चाहते हैं; पर जिस तरफ हम मुड़ते हैं, उसी तरफ वह भी मुड़ता है और एक सेकेंड तक यही दाव-घात होता रहता है वही तमाशा यहाँ भी हो रहा था। सुखदा को ऐसा आभास हुआ, मानों यह जानदार है, मानों नन्हें नन्हें बालक गोल टोपियाँ लगाये जल-क्रीड़ा कर रहे हैं।

इसी वक्त नैना ने पुकारा-भाभी, आओ, नाव-नाव खेलें। मैं नाव बना रही हूँ।

सुखदा ने बुलबुलों की ओर ताकते हुए जवाब दिया--तुम खेलो,. मेरा जी नहीं चाहता।

नैना ने न माना। दो नाव लिये आकर सुखदा को उठाने लगी-- जिसकी नाव किनारे तक पहुँच जाय उसकी जीत। पाँच-पाँच रुपये की बाजी।

सुखदा ने अनिच्छा से कहा- तुम मेरी तरफ़ से भी एक नाव छोड़ दो। जीत जाना तो रुपये ले लेना; पर उसकी मिठाई नहीं आवेगी, बताये देती हूँ।

'तो क्या दवायें आयेंगी?'

कर्मभूमि
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