पृष्ठ:कर्मभूमि.pdf/२६२

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बरामदे में आ खड़ी हुई। वह कुछ देर कमरे में मेरी प्रतीक्षा करते रहे, फिर झल्लाकर उठे और मेरा हाथ पकड़कर कमरे में ले जाना चाहा। मैने झटके से अपना हाथ छुड़ा लिया और कठोर स्वर में बोली--मैं यह अपमान नहीं सह सकती।

आप बोले--उफ्फोह, इस रूप पर इतना अभिमान!

मेरी देह में आग लग गयी। कोई जवाब न दिया। ऐसे आदमी से बोलना भी मुझे अपमानजनक मालूम हुआ। मैंने अन्दर जाकर किवाड़ बन्द कर लिये और उस दिन से फिर न बोली। मैं तो ईश्वर से यही मनाती हूँ कि वह अपना विवाह कर लें और मझे छोड़ दें। जो स्त्री में केवल रूप देखना चाहता है, जो केवल हाव-भाव और दिखावे का गुलाम है, जिसके लिए स्त्री केवल स्वार्थसिद्धि का साधन है, उसे मैं अपना स्वामी नहीं कह सकती।

सुखदा ने विनोद-भाव से पूछा--लेकिन तुमने ही अपने प्रेम का कौन सा परिचय दिया। क्या विवाह के नाम में ही इतना बरकत है कि पतिदेव आते-ही-आते तुम्हारे चरणों पर सिर रख देते?

नैना गंभीर होकर बोली--हाँ, मैं तो समझती हूँ विवाह के नाम में ही बरकत है। जो विवाह को धर्म का बन्धन नहीं समझता है, उसे केवल वासना की तृप्ति का साधन समझता है, वह पशु है।

सहसा शांतिकुमार पानी में लथपथ आकर खड़े हो गये।

सुखदा ने पूछा--भीग कहां गये, क्या छतरी न थी?

शांतिकुमार ने बरसाती उतार कर अलगनी पर रख दी और बोले--आज बोर्ड का जलसा था। लौटते वक्त कोई सवारी न मिली।

'क्या हुआ बोर्ड में? हमारा प्रस्ताव पेश हुआ!'

'वही हुआ, जिसका भय था।'

'कितने वोटों से हारे!'

'सिर्फ पाँच वोटों से। इन्हीं पांचों ने दगा दी। लाला धनीराम ने कोई बात उठा नहीं रखी।'

सुखदा ने हतोत्साह होकर कहा--तो फिर अब?

'अब तो समाचार-पत्रों और व्याख्यानों से आन्दोलन करना होगा।'

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कर्मभूमि