पृष्ठ:कर्मभूमि.pdf/३०१

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मुन्नी बोली--अच्छा, तो चलो मेरे घर खा लो।

सलोनी ने सजल-नेत्र होकर कहा--तू आज खिला देगी बेटी, अभी तो पूरा चौमासा पड़ा हुआ है। आजकल तो कहीं घास भी नहीं मिलती। भगवान् न-जाने कैसे पार लगायेंगे। घर में अन्न का एक दाना भी नहीं है। डाँड़ी अच्छी होती, तो बाकी देके चार महीने निबाह हो जाता। इस डॉंड़ी में आग लगे, आधी वाकी भी न निकली। अमर भैया को तू समझाती नहीं, स्वामीजी को बढ़ने नहीं देते।

मुन्नी ने मुँह फेरकर कहा--मुझसे तो आजकल रूठे हुए हैं, बोलते ही नहीं। काम-धन्धे से फ़ुरसत ही नहीं मिलती। घर के आदमी से बातचीत करने को भी फ़ुरसत चाहिए। जब फटेहालों आये थे, तब फ़ुरसत थीं। यहाँ जब दुनिया मानने लगी, नाम हुआ, बड़े आदमी बन गये, तो अब फ़ुरसत नहीं है।

सलोनी ने विस्मय-भरी आँखों से मुन्नी को देखा--क्या कहती है बहू, वह तुझसे रूठे हुए हैं? मुझे तो विश्वास नहीं आता। तुझे धोखा हुआ है। बेचारा रात-दिन तो दौड़ता है, न मिली होगी फ़ुरसत। मैंने तुझे जो असीस दिया है, वह पूरा होके रहेगा, देख लेना।

मुन्नी अपनी अनुदारता पर सकुचाती हुई बोली--मुझे किसी की परवाह नहीं है काकी! जिसे सौ बार गरज पड़े बोले, नहीं न बोले। वह समझते होंगे--मैं उनके गले पड़ी जा रही हूँ। मैं तुम्हारे चरन छूकर कहती हूँ काकी, जो यह बात कभी मेरे मन में आई हो। मैं तो उनके पैरों की धूल के बराबर भी नहीं हूँ। हाँ, इतना चाहती हूँ कि वह मुझसे मन से बोलें, जो कुछ थोड़ी बहुत सेवा करूँ, उसे मन से लें। मेरे मन में बस इतनी ही साध है, कि मैं जल चढ़ाती जाऊँ और वह चढ़वाते जायें। और कुछ नहीं चाहती।

सहसा अमर ने पुकारा। सलोनी ने बुलाया--आओ भैया, अभी बहू आ गयी, उसी से बतिया रही हूँ।

अमर ने मुन्नी की ओर देखकर तीखे स्वर में कहा--मैंने तुम्हें दो बार पुकारा मुन्नी, तुम बोली क्यों नहीं?

मुन्नी ने मुंँह फेरकर कहा--तुम्हें किसी से बोलने की फ़ुरसत नहीं है,

कर्मभूमि
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