पृष्ठ:कर्मभूमि.pdf/३२०

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सलीम ने व्यथित कण्ठ से कहा--मैं जानता कि यहाँ आते-ही-आते इस अजाब में जान फंँसेगी, तो किसी और जिले को कोशिश करता। क्या अब मेरा तबादला नहीं हो सकता?

थानेदार ने पूछा--हुजूर कोई खत न देंगे?

ग़ज़नवी ने डाँट बतायी--ख़त की जरूरत नहीं है। क्या तुम इतना भी नहीं कह सकते?

थानेदार सलाम करके चला गया, तो सलीम ने कहा--आपने इसे बुरी तरह डाँटा, बेचारा रुआँसा हो गया। आदमी अच्छा है।

ग़ज़नवी ने मुसकराकर कहा--जी हाँ, बहुत अच्छा आदमी है। रसद खूब पहुँचाता होगा; मगर रिआया से उसकी दसगुनी वसूल करता है। जहाँ किसी मातहत ने ज़रूरत से ज्यादा खिदमत और खुशामद की, मैं समझ जाता हूँ कि यह छटा हुआ गुर्गा है। आपकी लियाकत का यह हाल है कि इलाके में सदा वारदातें होती हैं, एक का भी पता नहीं चलता। इसे झुठी शहादतें बनाना भी नहीं आता। बस खुशामद की रोटियाँ खाता है। अगर सरकार पुलिस का सुधार कर सके, तो स्वराज्य की माँग पचास साल के लिए टल सकती है। आज कोई शरीफ़ आदमी पुलिस से सरोकार नहीं रखना चाहता। थाने को बदमाशों का अड्डा समझकर उधर से मुंह फेर लेता है। यह सीगा इस राज का कलंक है। अगर आपको अपने दोस्त को गिरफ्तार करने में तकल्लुफ़ हो, तो मैं डी० एस० पी० को ही भेज दूं। उन्हें गिरफ्तार करना अब हमारा फर्ज हो गया है। अगर आप यह नहीं चाहते कि उनकी जिल्लत हो, तो आप जाइए। अपनी दोस्ती का हक़ अदा करने ही के लिए जाइए। मैं जानता हूँ, आपको सदमा हो रहा है। मुझे खुद रंज है। उस थोड़ी देर की मुलाकात में ही मेरे दिल पर उनका सिक्का जम गया। मैं उनके नेक इरादों की क़द्र करता हूँ; लेकिन हम और वह दो कैम्पों में हैं। स्वराज्य हम भी चाहते हैं; मगर इनक़लाब की सूरत में नहीं। हालाँकि कभी-कभी मुझे भी ऐसा मालूम होता है कि इनक़लाब के सिवा हमारे लिए दूसरा रास्ता नहीं हैं। इतनी फौज रखने की क्या जरूरत है, जो सरकार की आमदनी का आधा हजम कर जाय। फ़ौज का खर्च आधा कर दिया जाय, तो किसानों का लगान बड़ी आसानी से आधा हो सकता है। मुझे अगर

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कर्मभूमि