पृष्ठ:कर्मभूमि.pdf/३३०

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में प्रकाश का स्वप्न देख रही थी, वह दीपक कोई उसके हदय से निकाले लिये जाता है। वह सूना अन्धकार क्या फिर वह सह सकेगी!

सहसा उसने उत्तेजित होकर कहा--इतने जने खड़े ताकते क्या हो! उतार लो मोटर से! जन-समूह में एक हलचल मची। एक ने दूसरे की ओर कैदियों की तरह देखा; कोई बोला नहीं।

मुन्नी ने फिर ललकारा--खड़े ताकते क्या हो, तुम लोगों में कुछ हया है या नहीं! जब पुलिस और फौज इलाके को खून से रंग देती, तभी...

अमर ने मोटर से निकलकर कहा---मुन्नी, तुम बुद्धिमती होकर ऐसी बातें कर रही हो! मेरे मुँह में कालिख मत लगाओ।

मुन्नी उन्मत्तों की भाँति बोली---में बुद्धिमान् नहीं, मैं तो मूरख हूँ, गॅवारिन हूँ। आदमी एक-एक पत्ती के लिए सिर कटा देता है, एक-एक बात पर जान दे देता है। क्या हम लोग खड़े ताकते रहें और तुम्हें कोई पकड़ ले जाय? तुमने कोई चोरी की है, डाका मारा है?

कई आदमी उत्तेजित होकर मोटर की ओर बढ़े; पर अमरकान्त की डाँट सुनकर ठिठक गये--क्या करते हो! पीछे हट जाओ। अगर मेरे इतने दिनों की सेवा और शिक्षा का यही फल है, तो मैं कहूँगा कि मेरा सारा परिश्रम धूल में मिल गया। यह हमारा धर्म-युद्ध है और हमारी जीत हमारे त्याग, हमारे बलिदान और हमारे सत्य पर है।

जादू का-सा असर हुआ। लोग रास्ते से हट गये। अमर मोटर में बैठ गया और मोटर चली।

मुन्नी ने आँखों में क्षोभ और क्रोध के आँसू भर अमरकान्त को प्रणाम किया। मोटर के साथ जैसे उसका हृदय भी उड़ा जाता हो।

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कर्मभूमि