पृष्ठ:कर्मभूमि.pdf/३३३

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लखनऊ का सेंट्रल जेल शहर के बाहर खुली हुई जगह में है। सुखदा उसी जेल के जनाने वार्ड में एक वृक्ष के नीचे बादलों की घुड़दौड़ देख रही है। बरसात बीत गयी है। आकाश में बड़ी धूम से घेर-घार होता है; पर छींटे पड़कर रह जाते हैं। दानी के दिल में अब भी दया है; पर हाथ खाली है। जो कुछ था लुटा चुका।

जब कोई अन्दर आता है और सदर दरवाजा खुलता है, तो सुखदा द्वार के सामने आकर खड़ी हो जाती है। द्वार एक क्षण में बन्द हो जाता है; पर बाहर के संसार की उसी झलक के लिए वह कई-कई घण्टे वृक्ष के नीचे खड़ी रहती है, जो द्वार के सामने हैं। उस मोल-भर की चहारदीवारी के अन्दर जैसे उसका दम घुटता है। उसे यहाँ आये अभी पूरे दो महीने भी न हुए, ऐसा जान पड़ता है, दुनिया में न-जाने क्या-क्या परिवर्तन हो गये। पथिकों को राह चलते देखने में भी अब एक विचित्र आनन्द था। बाहर का संसार कभी इतना मोहक न था।

वह कभी-कभी सोचती है--उसने सफ़ाई दी होती, तो शायद बरी हो जाती; पर क्या मालूम था, चित्त की यह दशा होगी। वे भावनाएँ, जो कभी भूलकर मन में न आती थीं, अब किसी रोगी की कुपथ्य-चेष्टाओं की भाँति मन को उद्विग्न करती रहती थीं। झूला झूलने की उसे इच्छा न होती थी; पर आज बार-बार जी चाहता था---रस्सी हो, तो इसी वृक्ष में झूला डालकर झूले। अहाते में ग्वालों की लड़कियाँ भैसें चराती हुई आम की उबाली हुई गुठलियाँ तोड़-तोड़ कर खा रही हैं। सुखदा ने एक बार बचपन में एक गुठली चखी थी उस वक्त वह कसैली लगी थी। फिर उस अनुभव को उसने नहीं दुहराया; पर इस समय उन गुरुलियों पर उसका मन ललचा रहा

कर्मभूमी
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