पृष्ठ:कर्मभूमि.pdf/३३९

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चौकीदारिन ने कैदिन की पीठ पर लात मारकर कहा---राँड़, तुझे झाड़ू लगाना भी नहीं आता। गर्द क्यों उड़ाती है? हाथ दबाकर लगा।

कैदिन ने झाड़ू फेंक दी और तमतमाये हुए मुख से बोली---मैं यहाँ किसी की टहल करने नहीं आई हूँ।

'तब क्या रानी बनकर आई है।'

'हाँ, रानी बनकर आई हूँ। किसी की चाकरी करना मेरा काम नहीं है।'

'तू झाड़ू लगायेगी कि नहीं?'

'भलमनसी से कहो, तो मैं तुम्हारे भंगी के घर में झाड़ू लगा दूँगी; लेकिन मार का भय दिखाकर तुम मुझसे राजा के घर में भी झाड़ू नहीं लगवा सकती। इतना समझ रखो।'

'तू न लगायेगी झाड़ू?'

'नहीं!'

चौकीदारिन ने कैदिन के केश पकड़ लिये और खींचती हई कमरे के बाहर ले चली। रह-रहकर गालों पर तमाचे भी लगाती जाती थी।

'चल जेलर साहब के पास!'

'हाँ, ले चलो। मैं यही उनसे भी कहूँगी। मार-गाली खाने नहीं आयी हूँ।'

सुखदा के लगातार लिखा-पढ़ी करने पर यह टहलनी दी गयी थी; पर यह कांड देखकर सुखदा का मन क्षुब्ध हो उठा। इस कमरे में क़दम रखना भी उसे बुरा लग रहा था।

कैदिन ने उसकी ओर सजल आँखों से देखकर कहा---तुम गवाह रहना। इस चौकीदारिन ने मुझे कितना मारा है।

सुखदा ने समीप जाकर चौकीदारिन को हटाया और कैदिन का हाथ पकड़कर कमरे में ले गयी।

चौकीदारिन ने धमकाकर कहा---रोज सबेरे यहाँ आ जाया कर। जो काम यह कहें वह किया कर। नहीं डण्डे पड़ेंगे।

कैदिन क्रोध से काँप रही थी---मैं किसी की लौंडी नहीं हूँ और न यह काम करूँगी। किसी रानी-महरानी की टहल करने नहीं आई। जेल में सब बराबर हैं!

कर्मभूमि
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