पृष्ठ:कर्मभूमि.pdf/३५७

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'जब कुछ है ही नहीं, तो दोगे कहाँ से?'

स्वामीजी हटे तो सलीम ने आकर सेठजी के कान में कुछ कहा।

सेठजी मुसकराकर बोले--जंट साहब तुम लोगों को दवा-दारू के लिए १००) भेंट कर रहे हैं। मैं अपनी ओर से उसमें ९००) मिलाये देता हूँ। स्वामीजी डाक-बँगले पर चलकर मुझसे रुपये ले लो।

गूदड़ ने कृतज्ञता को दबाते हुए कहा---भैया ...पर मुख से एक शब्द भी न निकला।

समरकान्त बोले---यह मत समझो कि यह मेरे रुपये हैं। मैं अपने बाप के घर से नहीं लाया। तुम्हीं से, तुम्हारा ही गला दबाकर लिये थे। वह तुम्हें लौटा रहा हूँ!

गाँव में जहाँ सियापा-सा छाया हुआ था, वहाँ रौनक नज़र आने लगी। जैसे कोई संगीत वायु में घुल गया हो।


अमरकान्त को जेल में रोज़-रोज़ का समाचार किसी-न-किसी तरह मिल जाता था। जिस दिन मार-पीट और अग्निकांड की ख़बर मिली, उसके क्रोध का वारा-पार न रहा और जैसे आग बुझकर राख हो जाती है, थोडी ही देर के बाद क्रोध की जगह केवल नैराश्य रह गया। लोगों के रोने-पीटने की दर्दभरी हाय-हाय जैसे मूर्तिमान होकर उसके सामने सिर पीट रही थी। जलते हुए घरों की लपटें जैसे उसे झुलसे डालती थीं। वह सारा भीषण दृश्य कल्पनातीत होकर सर्वनाश के समीप जा पहुँचा था और इसकी जिम्मेदारी किस पर थी? रुपये तो यों भी वसूल किये जाते; पर इतना अत्याचार तो न होता, कुछ रिआयत तो की जाती। सरकार इस विद्रोह के बाद किसी तरह भी नर्मी का बर्ताव न कर सकती थी; लेकिन रुपये न दे सकना तो किसी मनुष्य का दोष नहीं। यह मन्दी की बला कहाँ से आयी, कौन जाने। यह तो ऐसा ही है कि आँधी में किसी का छप्पर उड़ जाय और सरकार उसे दण्ड दे। यह शासन किसके हित के लिए है? इसका उद्देश्य क्या है?

कर्मभूमि
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