पृष्ठ:कर्मभूमि.pdf/३६

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अमर को शराब की ऐसी दुर्गन्ध आई, कि उसने नाक बन्द कर ली और मुंह फेरकर बोला--क्या तुम शराब पीते हो ?

काले खाँ ने हँसकर कहा--शराब किसे मयस्सर होती है, लाला, रूखी रोटियाँ तो मिलती नहीं। आज एक नातेदारी में गया था, उन लोगों ने पिला दी।

वह और समीप आ गया और अमर के कान के पास मुंह लगाकर बोला--एक रकम दिखाने लाया था, कोई दस तोले की होगी। बाजार में ढाई सौ से कम की नहीं है। लेकिन मैं तुम्हारा पुराना असामी हूँ। जो कुछ दे दोगे, ले लूँगा।

उसने कमर से एक जोड़ा सोने के कड़े निकाले और अमर के सामने रख दिये। अमर ने कड़ों को बिना उठाये हुए पूछा--यह कड़े तुमनें कहाँ पाये ?

काले खाँ ने बेहयाई से मुस्कराकर कहा--यह न पूछो राजा, अल्लाह देने वाला है।

अमरकान्त ने घृणा का भाव दिखाकर कहा--कहीं से चुरा लाये होगे ?

काले खाँ फिर हँसा--चोरी किसे कहते हैं राजा, यह तो अपनी खती है। अल्लाह ने सब के पीछे हीला लगा दिया है। कोई नौकरी करके लाता है, कोई मजूरी करता है, कोई रोजगार करता है, देता सबको वही खुदा है। तो फिर निकालो रुपये, मुझे देर हो रही है। इन लाल पगड़ी वालों की बड़ी खातिर करनी पड़ती है भैया, नहीं एक दिन काम न चले।

अमरकान्त को यह व्यापार इतना जघन्य जान पड़ा, कि जी में आया काले खाँ को दुत्कार दे। लाला समरकान्त ऐसे समाज के शत्रुओं से व्यवहार रखते हैं, यह खयाल करके उसके रोएँ खड़े हो गये। उस दुकान से, उस मकान से, उस वातावरण से, यहाँ कि तक स्वयं अपने आपसे घृणा होने लगी। बोला--मुझे इस चीज़ की जरूरत नहीं है, इसे ले जाओ, नहीं मैं पुलिस में इत्तला कर दूँगा। फिर इस दुकान पर ऐसी चीज़ लेकर न आना, कहे देता हूँ।

काले खाँ जरा भी विचलित न हुआ, बोला--यह तो तुम बिल्कुल नयी बात कहते हो भैया। लाला इस नीति पर चलते, तो आज महाजन न होते। हजारों रुपये की चीज तो मैं ही दे गया हूँगा। अँगनू, महाजन, भिखारी,

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कर्मभूमि