पृष्ठ:कर्मभूमि.pdf/३६०

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करा दिया है। शरीफ़ आदमी हैं। गाँववालों के इलाज-मालजे के लिए एक हजार रुपये दे दिये।'

अमर मुसकराया।

'उन्हीं की कोशिश से तुम्हारा तबादला हो रहा है। लखनऊ में तुम्हारी बीबी भी आ गयी हैं। शायद उन्हें छ: महीने की सजा हुई है।'

अमर खड़ा हो गया--सुखदा भी लखनऊ में है?

'और तुम्हारा तबादला क्यों हो रहा है!'

अमर को अपने मन में विलक्षण शान्ति का अनुभव हुआ। वह निराशा कहाँ गयी? दुर्बलता कहाँ गयी?

वह फिर बैठकर बान बटने लगा। उसके हाथों में आज गज़ब की फुरती है। ऐसी कायापलट! ऐसा मंगलमय परिवर्तन! क्या अब भी ईश्वर की दया में कोई सन्देह हो सकता है। उसने काँटे बोये थे। वह सब फल हो गये!

सुखदा आज जेल में है। जो भोग-विलास पर आसक्त थी, वह आज दीनों की सेवा में अपना जीवन सार्थक कर रही है। पिताजी, जो पैसों को दाँत से पकड़ते थे, वह आज परोपकार में रत हैं। कोई दैवी शक्ति नहीं है तो यह सब कुछ किसकी प्रेरणा से हो रहा है!

उसने मन की संपूर्ण श्रद्धा से ईश्वर के चरणों में वन्दना की। वह भार, जिसके बोझ से वह दबा जा रहा था, उसके सिर से उतर गया था, उसकी देह हलकी थी, मन हलका था और आगे आनेवाली ऊपर की चढ़ाई मानो उसका स्वागत कर रही थी।


अमरकान्त को लखनऊ-जेल में आये तीसरा दिन है। यहाँ उसे चक्की का काम दिया गया है। जेल के अधिकारियों को मालम है, वह धनी का पुत्र है; इसलिए उसे कठिन परिश्रम देकर भी उसके साथ कुछ रियायत की जाती है।

एक छप्पर के नीचे चक्कियों की कतारें लगी हुई हैं। शाम को आटे की तौल होगी। आटा कम निकला तो दण्ड मिलेगा।

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कर्मभूमि