पृष्ठ:कर्मभूमि.pdf/४०

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'नहीं बेटा, ऐसा काम नहीं करती, जिसमें पीछे से कोई बात पैदा हो। फिर आऊँगी।'

'नहीं मैं बिना रुपये लिये न जाने दूँगा।'

बुढ़िया ने डरते-डरते कहा--तो लाओ दे दो बेटा, मेरा नाम टाँक लेना पठानिन।

अमरकान्त ने रुपये दे दिये। बुढ़िया कांपते हुए हाथों से रुपये लेकर गिरह बांधे और दुआएँ देती हुई, धीरे-धीरे सीढ़ियों से नीचे उतरी; मगर पचास कदम भी न गयी होगी कि पीछे से अमरकान्त एक इक्का लिये हुए आया और बोला--बूढ़ी माता, आकर इक्के पर बैठ जाओ, मैं तुम्हें पहुँचा दूँ।

बुढ़िया ने आश्चर्य-चकित नेत्रों से कहा--अरे नहीं बेटा, तुम मुझे पहुँचाने कहाँ जाओगे। मैं टेकती हुई चली जाऊँगी। अल्ला तुम्हे सलामत रखे।

अमरकान्त इक्का ला चुका था। उसने बुढ़िया को गोद में उठाया और इक्के पर बैठाकर पूछा--कहां चलूँ ?

बुढ़िया ने इक्के के डंडों को मजबूत पकड़कर कहा--गोबर्धन की सराय चलो बेटा, अल्लाह तम्हारी उम्र दराज करे। मेरा बच्चा इस बुढ़िया के लिए इतना हैरान हो रहा। इत्ती दूर से दौड़ा आया। पढ़ने जाते हो न बेटा, अल्लाह तुम्हें बड़ा दरजा दें।

पन्द्रह - बीस मिनट में इक्का गोबर्धन की सराय पहुँच गया। सड़क के दाहने हाथ एक गली थी। वहाँ बुढ़िया ने इक्का रुकवा दिया, और उतर पड़ी। इक्का आगे न जा सकता था। मालूम पड़ता था, अँधेरे में मुंह पर तारकोल पोत लिया है।

अमरकान्त ने इक्के को लौटाने के लिए कहा, बुढ़िया बोली--नहीं मेरे लाल, इत्ती दूर आये हो, तो पल भर मेरे घर भी बैठ लो, तमने मरा कलेजा ठंढा कर दिया।

गली में बड़ी दुर्गन्ध थी। गन्दे पानी के नाले दोनों तरफ बह रहे थे। घर प्रायः सभी कच्चे थे। गरीबों का मुहल्ला था। शहरों के बाजारों और गलियों में कितना अंतर है ! एक फूल है--सुन्दर, स्वच्छ, सुगन्धमय ;

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कर्मभूमि