पृष्ठ:कर्मभूमि.pdf/४१

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दूसरी जड़ है--कीचड़ और दुर्गन्ध से भरी, टेढ़ी-मेढ़ी ! लेकिन क्या फूल को मालूम है कि उसकी हस्ती जड़ से है ?

बुढ़िया ने एक मकान के सामने खड़े होकर धीरे से पुकारा--सकीना ! अन्दर से आवाज आई--आती हूँ अम्मा । इतनी देर कहाँ लगाई ?

एक क्षण में सामने का द्वार खुला और एक बालिका हाथ में मिट्टी के तेल की एक कुप्पी लिये द्वार पर खड़ी हो गयी। अमरकान्त बुढ़िया के पीछे खड़ा था। उस पर बालिका की निगाह न पड़ी; लेकिन बुढ़िया आगे बढ़ी तो सकीना ने अमर को देखा। तुरन्त ओढ़नी से मुंह छिपाती हुई पीछे हट गयी और धीरे से पूछा--यह कौन है अम्मा ?

बुढ़िया ने कोने में अपनी लकड़ी रख दी और बोली--लाला का लड़का है, मझे पहुँचाने आया है। ऐसा नेक और शरीफ़ लड़का तो मैंने देखा ही नहीं।

उसने अब तक का सारा वृत्तान्त अपने आशीर्वादों से भरी भाषा में कह सुनाया और बोली--आँगन में खाट डाल दे बेटी, जरा बुला लूँ। थक गया होगा।

सकीना ने एक टूटी-सी खाट आँगन में डाल दी और ऊपर से एक सड़ी-सी चादर बिछाती हुई बोली--इस खटोले पर क्या बिठाओगी अम्मा, मुझे तो शर्म आती है।

बुढ़िया ने जरा कड़ी आँखों से देखकर कहा--शर्म की क्या बात है इसमें? हमारा हाल क्या इनसे छिपा है ?

उसने बाहर जाकर अमरकान्त को बुलाया। द्वार पर एक टाट का फटा-पुराना परदा पड़ा हुआ था। द्वार के अन्दर कदम रखते ही एक आँगन था, जिसमें मुश्किल से दो खटोले पड़ सकते थे। सामने खपरैल का नीचा सायबान था और सायबान के पीछे एक कोठरी थी, जो इस वक्त अँधेरी पड़ी हुई थी। सायबान में एक किनारे चूल्हा बना हुआ था और टीन और मिट्टी के दो-चार बरतन, एक घड़ा और एक मटका रखे हुए थे। चूल्हे में आग जल रही थी और तवा रखा हुआ था।

अमर ने खाट पर बैठते हुए कहा--यह घर तो बहुत छोटा है। इसमें गुजर कैसे होती है ?

कर्मभूमि
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