पृष्ठ:कर्मभूमि.pdf/४२

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बुढ़िया खाट के पास जमीन पर बैठ गयी और बोली--बेटा अब तो दो ही आदमी है, नहीं इसी घर में एक पूरा कुनबा रहता था। मेरे दो दो बेटे, दो बहऐं, उनके बच्चे सब इसी घर में रहते थे। इसी में सबों के शादी-ब्याह हुए और इसी में सब मर भी गये। उस वक्त यह ऐसा गुलजार लगता था, कि तुमसे क्या कहूँ। अब मैं हूँ और मेरी पोती यह है। और सबको अल्लाह ने बुला लिया। पकाते हैं, खाते हैं और पड़े रहते हैं। तुम्हारे पठान के मरते ही घर में जैसे झाडू फिर गयी। अब तो अल्लाह से यही दुआ है कि मेरे जीत-जी यह किसी भले आदमी के पल्ले पड़ जाय, तब अल्लाह से कहूँगी, कि अब मुझे उठा लो। तुम्हारे यार दोस्त तो बहुत होंगे बेटा, अगर शर्म की बात न समझो तो किसी से ज़िक्र करना। कौन जाने तुम्हारे ही हीले से कहीं बात-चीत ठीक हो जाय।

सकीना कुरता-पायजामा पहने, ओढ़नी से माथा छिपाये सायबान में खड़ी थी। बुढ़िया ने ज्यों ही उसकी शादी की चर्चा छेड़ी, वह चूल्हे के पास जा बैठी और आटे को अँगुलियों से गोदने लगी। वह दिल में झुंझला रही थी कि अम्माँ क्यों इनसे मेरा दुखड़ा ले बैठीं। किससे कौन बात कहनी चाहिए, कौन बात नहीं, इसका इन्हें जरा भी लिहाज नहीं। जो ऐरा-गैरा आ गया, उसी से शादी का पचड़ा गाने लगीं। और सब बातें गयीं, बस एक शादी रह गयी !

उसे क्या मालूम, कि अपनी सन्तान को विवाहित देखना बुढ़ापे की सबसे बड़ी अभिलाषा है।

अमरकान्त ने मन में मुसलमान मित्रों का सिंहावलोकन करते हुए कहा--मेरे मुसलमान दोस्त ज्यादा तो नहीं हैं लेकिन जो दो-एक है,उनसे मैं जिक्र करूँगा।

वृद्धा ने चिन्तित भाव से कहा--वह लोग धनी होंगे?

'हाँ, सभी खुशहाल हैं।'

'तो भला धनी लोग हम गरीबों की बात क्यों पूछेगे। हालाँकि हमारे नबी का हुक्म है कि शादी-ब्याह में अमीर गरीब का खयाल न होना चाहिए; पर उनके हुक्म को कौन मानता है ! नाम के मुसलमान, नाम के हिन्दू रह गये हैं। न कहीं सच्चा मुसलमान नजर आता है, न सच्चा हिन्दू। मेरे घर का तो

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कर्मभूमि