पृष्ठ:कर्मभूमि.pdf/४६

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ठीकेदार रह गये हो, और तो सब अधर्मी हैं। वही माल जो तुमने अपने घमंड में लौटा दिया, तुम्हारे किसी दूसरे भाई ने दो-चार रुपये कम-बेश देकर ले लिया होगा। उसने तो रुपये कमाये, तुम नीबू नोन चाट कर रह गये। डेढ़ सौ रुपये तब मिलते हैं, जब डेढ़ सौ थान कपड़ा या डेढ़ सौ बोरे चीनी बिक जायँ। मुंह का कौर नहीं है। अभी कमाना नहीं पड़ा है, दूसरों की कमाई से चैन उड़ा रहे हो, तभी ऐसी बातें सूझती हैं। जब अपने सिर पड़ेगी, तब आंखें खुलेंगी।

अमर अब भी कायल न हुआ। बोला--मैं कभी यह रोज़गार न करूँगा।

लालाजी को लड़के की मूर्खता पर क्रोध की जगह क्रोध-मिश्रित दया आ गयी। बोले--तो फिर कौन रोजगार करोगे ? कौन रोज़गार है, जिसमें तुम्हारी आत्मा की हत्या न हो; लेन-देन, सूद-बट्टा, अनाज-कपड़ा तेल-धी सभी रोजगारों में दांव-घात है। जो दांव-घात समझता है, वह नफा उड़ाता है, जो नहीं समझता, उसका दिवाला पिट जाता है। मझे कोई ऐसा रोजगार बता दो, जिसमें झूठ न बोलना पड़े, बेईमानी न करनी पड़े। इतने बड़े-बड़े हाकिम है, बताओ कौन घूस नहीं लेता ? एक सीधी-सी नक़ल लेने जाओ तो एक रुपया लग जाता है। बिना तहरीर किये थानेदार रपट तक नहीं लिखता। कौन वकील है, जो झूठे गवाह नहीं बनाता ? लीडरों ही में कौन है, जो चन्दे के रुपये में नोच-खसोट न करता हो ? माया पर तो संसार की रचना हुई है, इससे कोई कैसे बच सकता है ?

अमर ने उदासीन भाव से सिर हिलाकर कहा--अगर रोजगार का यह हाल है, तो मैं रोज़गार करूँगा ही नहीं।

'तो घर-गिरस्ती कैसे चलेगी ? कुएँ में पानी की आमद न हो, तो कै दिन पानी निकले !'

अमरकान्त ने इस विवाद का अन्त करने के इरादे से कहा--मै भूखों मर जाऊँगा। पर आत्मा का गला न घोटुंगा।

'तो क्या मजूरी करोगे?'

'मजूरी करने में कोई शर्म नहीं है।'

समरकान्त ने हथौड़े से काम चलते न देखकर धन चलाया--शर्म चाहे न हो, पर तुम कर न सकोगे, कहो लिख दूँ ! मुँह से बक देना सहल है,

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कर्मभूमि