पृष्ठ:कर्मभूमि.pdf/४८

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सुखदा और नैना दोनों उसके अन्तस्तल की दो कगारें थीं। सूखदा ऊँची, दुर्गम और विशाल थी। लहरें उसके चरणों ही तक पहुँचकर रह जाती थीं। नैना समतल, सुलभ और समीप। वायु का थोड़ा वेग पाकर भी लहरें उसके मर्मस्थल तक जा पहुँचती थीं।

अमर अपनी मनोव्यथा को मन्द मुस्कान की आड़ में छिपाता हुआ बोला--कोई नयी बात नहीं थी नैना। वही पुराना पचड़ा था। तुम्हारी भाभी तो नीचे नहीं थीं?

'अभी तक तो यहीं थीं। ज़रा देर हुई ऊपर चली गयीं।'

'तो आज उधर से भी शस्त्र-प्रहार होंगे। दादा ने तो आज मुझसे साफ़ कह दिया, तुम अपने लिए कोई राह निकालो, और मैं सोचता हूँ मुझे अब कुछ-न-कुछ करना चाहिये। यह रोज़-रोज़ की फटकार नहीं सही जाती। मैं कोई बुराई करूँ तो वह मुझे दस जूते भी जमा दें चूँ न करूँगा, लेकिन अधर्म पर मुझसे न चला जायगा।'

नैना से इस वक्त मीठी पकौड़ियां, नमकीन पकौड़ियां, खट्टी पकौड़ियां और न जाने क्या क्या पका रखे थे। उसका मन उन पदार्थों को खिलाने और खाने के आनन्द में बसा हुआ था। यह धर्म-अधर्म के झगड़े उसे व्यर्थ से जान पड़े। बोली--पहले चलकर पकौड़ियां खा लो, फिर इस विषय पर सलाह होगी।

अमर ने वितृष्णा के भाव से कहा---व्यालू करने की मेरी इच्छा नहीं है। लात की मारी रोटियां कंठ के नीचे न उतरेंगी। दादा ने आज फैसला कर दिया।

'अब तुम्हारी यही बात मुझे अच्छी नहीं लगती। आज की-सी मजेदार पकौड़ियाँ तुमने कभी न खायी होंगी। तुम न खाओगे, तो मैं भी न खाऊँगी।'

नैना की इस दलील ने उसके इन्कार को कई कदम पीछे ढकेल दिया--'तू मुझे बहुत दिक करती है नैना, सच कहता हूँ, मेरी बिलकुल इच्छा नहीं है।'

'चलकर थाल पर बैठो तो पकौड़ियाँ देखते ही टूट न पड़ो तो कहना।'

'तू जाकर खा क्यों नहीं लेती? मैं एक दिन न खाने से मर तो न जाऊँगा।'

'तो क्या मैं एक दिन न खाने से मर जाऊँगी? मैं तो निर्जला शिवरात्रि रखती हूँ, तुमने तो कभी व्रत नहीं रखा।'

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कर्मभूमि