पृष्ठ:कर्मभूमि.pdf/८

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में, मैं फ़ीस दिए देता हूँ; जरा-सी बात के लिए घण्टे भर से रो रहे हो। वह तो कहो मैं आ गया, नहीं तो आज जनाब का नाम ही कट गया होता!

अमरकान्त को तसल्ली तो हुई; पर अनुग्रह के बोझ से उसकी गर्दन दब गयी। बोला——पण्डितजी आज मान न जायेंगे?

सलीम ने खट्टे होकर कहा——पण्डितजी के बस की बात थोड़े ही है, यह सरकारी क़ायदा है, मगर हो तुम बड़े शैतान, वह तो खैरियत हो गयी, मैं रुपये लेता आया था, नहीं खूब इम्तहान देते! देखो, आज एक ताज़ा ग़ज़ल कही है। पीठ सहला देना——

आपको मेरी वफ़ा याद आई,
खै़र है आज यह क्या याद आई।

अमरकान्त का व्यथित चित्त इस समय ग़ज़ल सुनने को तैयार न था; पर सुने बगैर काम भी तो नहीं चल सकता। बोला——नाज़ुक चीज़ है। खूब कहा है। मैं तुम्हारी ज़बान की सफ़ाई पर जान देता हूँ।

सलीम यही तो ख़ास बात है भाई साहब! लफ्ज़ों की झंकार का नाम ग़ज़ल नहीं है। दूसरा शेर सुनो——

फिर मेरे सीने में एक हूक उठी,
फिर मुझे तेरी अदा याद आई

अमरकान्त ने फिर तारीफ़ की——लाजवाब चीज़ है। कैसे तुम्हें ऐसे शेर सूझ जाते हैं?

सलीम हँसा——उसी तरह, जैसे तुम्हें हिसाब और मजमन सूझ जाते हैं। जैसे ऐसोसियेशन में स्पीचें दे लेते हो। आओ पान खाते चलें।

दोनों दोस्तों ने पान खाये और स्कूल की तरफ़ चले। अमरकान्त ने कहा——पण्डितजी बड़ी डांट बतायेंगे।

'फीस ही तो लेंगे!'

'और जो पूछें, अब तक कहाँ थे?'

'कह देना, फ़ीस लाना भूल गया था।'

'मुझसे तो न कहते बनेगा। मैं साफ़-साफ़ कह दूँगा।'

'तो तुम पिटोगे भी मेरे हाथ से!"

कर्मभूमि