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श्री गोपाल कृष्ण गोखले

भारतीय महापुरुषों में यों तो प्रायः सभी के जीवन-चरित्र अतिशय उत्साहवर्द्धक हैं, पर उस निष्काम देशभक्ति और आत्मत्याग का उदाहरण, जिसने गोपाल कृष्ण गोखले को सारे राष्ट्र के लिए गर्व और गौरव की वस्तु बना रखा है, कठिनाई से और कहीं मिल सकता है। इसमें सन्देह नहीं कि देश में आज ऐसी विभूतियाँ विद्यमान है, जिनका बुद्धि-वैभव अधिक विशाल है, जिनको पाण्डित्य अधिक गंभीर है, जो पद-प्रतिष्ठा मैं आपसे बड़े हैं, पर वह सच्चा देश-प्रेम जिसके कारण आपने अपने आपको देश पर निछावर कर दिया है, अपनी विस्तृति, गहराई और लगन में बेजोड़ है। आपका जीवन उत्साही युवकों के लिए उच्छाकांक्षा का अनुकरणीय उदाहरण है। आज आपको देश के राजनीतिक मंडलों में बहुत ही ऊँचा पद प्राप्त है। और यह कहने में तनिक भी अत्युक्ति नहीं कि आपके देशवासी आपकी पूजा करते हैं। इसका प्रमाण इससे बढ़कर और क्या हो सकता है कि महात्मा गांधी जैसे पूजनीय पुरुष भी आपको अपना गुरु मानते हैं। और इसमें तो शक-शुबहे की गुंजाइश ही नहीं हैं कि व्यवस्थापिका सभा में अपने जो बड़े-बड़े काम किये हैं वह उसके इतिहास में चिरस्मरणीय रहेंगे।

गोखले का जन्म १८६३ ई० में महाराष्ट्र के कोल्हापुर नगर में हुआ। मा-बाप अगर निर्धन और अर्थकष्ट में न थे, तो किसी प्रकार संपन्न भी न थे। अपने वहीं के स्कूलों में पढ़ कर एफ० ए० पास किया और फिर बम्बई जाकर एलफिंस्टन कालिज में नाम लिखाया। प्राचीनता और देशोपकार की दृष्टि से यह क़ालिज भारत के सब