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श्री गोपाल कृष्ण गोखले
 


आप जैसे युवक के लिए जिसके पास न पैतृक सम्पत्ति थी और नए आमदनी बढ़ाने का और कोई ज़रिया, इस शिक्षा संस्था के उद्योगों में हाथ बँटाना साधारण बात न थी। खासकर उस अवस्था में जब कि उन पर बहुतों के भरण-पोषण का भार हो. प्रतिज्ञा-पत्र पर हस्ताक्षर करने से पहले कुछ समय तक आप बड़े पशोपेश में पड़े हुए थे, पर अंत में देश-प्रेम की विजय हुई और आप डेक्कन एजुकेशन सोसायटी में सम्मिलित हो गये, जिसका अर्थ यह था कि आप ७५ रुपये मासिक वेतन को उन्नति की चरम-सीमा समझकर २० वर्ष तक शिक्षण-कार्य करते रहें। इस त्याग से प्रकट हो सकता है कि अपकी दृष्टि में लोकहित का दरजा दूसरी लौकिक इच्छाओं की तुलना मैं क्या था। जब इस बात को सोचिए कि उस समय आपकी अवस्था कुल जमा १८ साल की थी, जब हृदय में उमंगों, आकांक्षाओं का सागर लहरात रहता है, तो स्वीकार करना पड़ता है कि आप सचमुच देवता थे। ऐसे देशभक्त तो बहुत मिलेंगे जो संसार के सुख-भोग से परितृप्त हो जाने के बाद अन्त के थोड़े-से दिन देशकार्य को दे दिया करते है, पर ऐसे कितने हैं जो मिस्टर गोखले की तरह अपना तन, मन, धन सब राष्ट्र के चरणों पर समर्पण कर देने को प्रस्तुत हो जायँ ?

उक्त संस्था में सम्मिलित होने के बाद आप बड़ी लगन, उत्साह और एकनिष्ठता के साथ अध्यापन-कार्य में जुट गये। अपने उत्साह और परिश्रम के कारण थोड़े ही समय में अध्यापकों में आपको विशिष्ट स्थान प्राप्त हो गया। और कुछ ही दिनों में आप कालेज के प्राण हों गये। उस समय कालेज की आर्थिक अवस्था ऐसी बुरी हो रही थी कि मजबूरन एक मामूली-से मकान में गुजर करना पड़ता था। आपने उसके लिए एक यथायोग्य, भव्य भवन बनवाने का निश्चय किया और अपने सहयोगिय के साथ दक्षिण देश का दौर शुरू किया। लगभग तीन बरस के अथक प्रयास के बाद अपने दो लाख रुपये एकत्र कर लिये। इस सफलता ने आपकी उद्योग-शीलता, कार्य- कुशलता और प्रबन्ध-पटुता का सिक्का बिठा दिया। कालेज के लिए