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कलम, तलवार और त्याग
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जल्द ही एक आलीशान इमारत बनकर तैयार हो गई जो सदा दाक्षिणात्यों की सच्ची देश-भक्ति और निःस्वार्थ प्रयत्न का प्रतीक बनी रहेगी। इस महिमा-मण्डित कालेज और उसके सच्ची लगनवाले कार्य- कर्ताओं के श्रम और उद्योग की सराहना लार्ड नार्थकोट और अन्य सज्जनों ने जिन शब्दों में की है, वह निश्चय ही अति उत्साह- वर्द्धक है।

चूँकि देश को गोखले का चिरऋणी होना था, इसलिए उसके सामान भी दैवगति से इकट्ठा होते गये। शिक्षा-संबंधी कार्य करते अभी पूरे तीन बरस भी न हुए थे कि आपको उस विद्या-गुण से पूरे, देवोपम, उदारहृदय, महापुरुष की शिष्यता का सुयोग प्राप्त हुआ जिसका यश आज भारत का बच्चा-बच्चा गा रहा है। ऐसा कौन होगा जो स्वर्गीय महादेव गोविन्द रानडे के पुनीत नाम से परिचित न हो ? हिन्दुस्तान की हर दरो-दीवार आज उस पुण्यकीर्ति को गुणगान कर रही है। उनका जीवन संसार के संपूर्ण सद्गुणों का उज्ज्वल उदाहरण है। उस देश के प्यारे के हृदय में देश और जाति की याद हरदम बनी रहती थी। भारतवर्ष की ऐसी कौन-सी सभा समिति थी जिसको उस साधु पुरुष से कुछ सहायता न मिली हो। उन दिनों पूने की सार्वजानिक सभा की ओर से पत्र निकालने के लिए एक उत्साही, परिश्रमी, प्रगतिशील विचारवाले युवक की आवश्यकता थी। मिस्टर गोखले को उम्र उस समय २२ साल से अधिक न थी। कितने ही परिपक्व वय और अनुभववाले सज्जन इस पद के लिए दावेदार थे। पर श्रीयुत रानडे की जौहरी निगाह में इस कार्य के लिए आपसे अधिक उपयुक्त दस दिखाई न दिया। वाह क्या परख थी! बाद की घटनाओं ने सिद्ध कर दिया कि रानडे का चुनाव इससे अच्छा हो ही नहीं सकता था।

पत्र-सम्पादन का भार अपने ऊपर लेते ही अपने देश की राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक समस्याओं का गंभीर अध्ययन आरंभ कर दिया, और इन गुत्थियों को सुलझाने के लिए मिस्टर रानडे से