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कलम, तलवार और त्याग
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अंग्रेजों की न्यायशीलता के लिए यही उचित है कि वह भारत सचिव से आग्रह अनुरोध करें। गरीब हिन्दुस्तान पर झल्लाना, जो स्वयं ही. दलित अपमानित हो रहा है, मर्दानगी की बात नहीं है।

प्रत्येक अवसर पर आपने ऐसे ही जोरदार भाषण किये। कटु, अप्रिय सत्य कहने में आपको कभी आगा-पीछा नहीं होता था। और इंगलैण्डवासियों की उदारता को भी धन्य है कि अपनी ही जाति के अन्याय-अत्याचार की कहानी सुनने के लिए हजारों की संख्या में जमा होते थे। यद्यपि इन नग्न सत्यो से उनके राष्ट्रीय अभिमान को चोट लगती थी, फिर भी विभिन्न सभा-समितियो से आपके पास भारत के विषय में कुछ कहने के लिए इतने निमन्त्रण आते थे कि कठोर परिश्रम के आदी होने पर भी सबको स्वीकार न कर सकते थे। भाषण के बीच में श्रोतसमूह ऐसे उत्साह से साधुवाद देता था और आदि से अन्त तक ऐसी सहानुभूति का परिचय देता था कि आपको स्वीकार करना पड़ता था कि अग्रेजों की न्यायवृत्ति अभी तक कुण्ठित नहीं हुई है। डेढ़ महीने के अल्प काल में आपने सारे इंगलैण्ड का दौरा किया और कितने ही भाषण किये, पर जिस जाति ने मुद्दतों से हिन्दुस्तान को अपनी मिलकियत समझ रखा हो, उस पर ऐसे भाषणों का क्या टिकाऊ असर पड़ सकता था। सम्मानित और सदाशय अंग्रेज सज्जनो ने सहानुभूति प्रकट की और बस। शासन यत्र उसी पुराने ढर्रे पर चलता रहा।

मातृभूमि! वह लोग अन्याय करते हैं जो कहते हैं कि हिन्दू जाति मृत, निष्प्राण हो गई है। जब तक दादाभाई. रावडे और गोखले जैसे बच्चे तेरी गोद में खेलेंगे, हिन्दू जाति कभी मुर्दा नहीं कही जा सकती। कौन कह सकता है कि अगर इन महापुरुषों का जन्म किसी स्वाधीन देश में हुआ होता तो वह ग्लॅखस्टन, बिस्मार्क या रूजवेल्ट न होते! - - -