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कलम, तलवार और त्याग
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प्रमाण था कि जाति में नव-जीवन का संचार और सच्चे स्वाधीनता प्रेम का प्रसार हो गया है।

गैरीबाल्डी ने पहले पोप के दरबार में नौकरी की दरख्वास्त दी। उसने पोप के बारे में जो अफवाहें सुनी थीं उनसे उसको विश्वास था कि वह अवश्य मेरी सेवा स्वीकार करेगा। और मुझे अस्ट्रियावालों का सिर कुचलने का अच्छा मौका हाथ आयेगा। पर पोप के सदुद्देश्यों की पोल बहुत जल्दी खुछ गई। उसने गेरीबाल्डी को नौकर रखने से ही इनकार नहीं किया, कुछ ऐसी कार्रवाइयाँ भी की जिनसे प्रकट हो गया कि वह भी ‘चोर-चोर मौसेरे भाई ही हैं। यहाँ से निराश होकर गेरीबाल्डी ने पेडमांड के बादशाह के सामने अपनी तलवार पेश की। यह वही हज़रत थे जिन्होंने पहले गेरीबाल्डी को बगावत की साजिश करने के अपराध में देशनिकाले का दण्ड दिया था। पर अब जनता के भाव की विरोध करने में कुशल न देख खुले तौर पर आस्ट्रिया का विरोध आरंभ कर दिया था। पर संभवतः यह अधिकतर प्रजा को धोखे में डालने के लिए ही था। गैरीबाल्डी को यहाँ से भी कोरा जवाब मिला। इसी बीच जन-विप्लव से भयभीत होकर पोप ने गेरुवा बाना उतार फेंका और रोम से भाग निकला।

पोप के पलायन को खबर ज्यों ही मशहूर हुई कि निर्वासित देश-भक्त अपने-अपने गुप्त स्थानों से निकलकर रोम की ओर दौड़े। और वहाँ एक पार्लमेण्ट स्थापित हुई जो चन्दरोजी होने के कारण अस्थायी सरकार' कहलाती है। यह दिन इटली के इतिहास में बड़ा शुभ था । जनता खुशी से फूली न समाती थी। इस सरकार ने गेरीबाल्डी की सेवा सहर्ष स्वीकार की और वह स्वयं-सेवकों का एक दल लेकर सीधा उत्तर की ओर चला। यहाँ अपने अवसरों पर उसने साहस और वीरता के जो काम किये, उन पर वीर से वीर सैनिक को गर्व हो सकता है। सतत सफलता से उसका यश और सम्मान दिन दिन बढ़ता गया। उसकी आदत शत्रु की शक्ति का अन्दाज़ा करने की न थी, और अपने साथियों की संख्या का भी वह कुछ ख्याल न करता। उसकी राजनीति यह थी कि जहाँ