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कलम, तलवार और त्याग
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पानीपत में एक छापाखाना खोला, जो कई साल तक चलता रहा। अलीगढ़ कालिज के विद्यार्थियों की मशहूर हड़ताल समाप्त होने के बाद स्वर्गवासी नवाब मुहसिनुलमुल्क ने मौलाना को अलीगढ़ गजट की संपादक के लिए बुलाया। मौलाना कई साल तक इस कार्य को बड़े उत्साह और तत्परता के साथ करते रहे। बाद में बीमारी से लाचार होकर इस्तीफा देकर घर लौट गये, और कई साल तक एकान्त वासी रहे। फिर जब लखनऊ के क्षितिज पर 'मुसलिम गज़ट' का उदय हुआ तो पत्र के संचालकों को आप ही उसका संपादन भार उठाने के योग्य दिखाई दिये और मौलाना हली के आग्रह से अपने यह पद स्वीकार कर लिया। यह वह समय था जब आधुनिक राजनीति का आरंभ हुआ था। मुसलमानों ने राजनीति के मैदान में कुछ लड़े कदम उठाये थे मुसलिम लीग के लक्ष्य में आत्मशासन की माँग सम्मिलित हो रही थी। मुसलिम विश्वविद्यालय का विधान बन रहा था और विश्वविद्यालय में सरकार के अधिकार का प्रश्न सारी जाति का ध्यान अपनी ओर खींच रहा था। तराचलस (ट्रिपोली ?) और अधिक के युद्धों ने मुसलमानों की अनुभूति के झकझोरकर जगा दिया था और इसके कुछ ही अरसे बाद कानपुर मसजिद की घटना से सारी मुसलिम जाति के भावों में उफान आ गया था। ऐसे समय में मौलाना की शक्तिशालिनी लेखनी ने ‘मुसलिम गजट' के पृष्ठ पर जो सपाटे भरे, जो रचना-चमत्कार दिखाया वह उर्दू साहित्य की अति मूल्यवान निधि है। सच यह है कि इस जमाने में मौलाना की करामाती क़लम ने सारी मुसलिम जाति की मनोवृत्ति में स्पष्ट क्रान्ति उत्पन्न कर दी। 'मुसलिम गजट' की धूम उस समय देश के कोने-कोने में मच रही थी। अन्त में अधिकारियों की दमननीति के कारण मौलाना को मुस्लिम गजट' का संपादन छोड़ना पड़ा, पर शीघ्र ही जमींदार' के प्रधान संपादक के पद पर बुला लिये गये। उस समय जमींदार' हिन्दुस्तान का सबसे अधिक छपने और बिकनेवाला अखबार था। अंग्रेजी अखबारों में भी केवल एक स्टेस्मैन ऐसा था जिसका