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डा० सर रामकृष्ण भांडारकर
 


विद्यार्थी और विषयों की तुलना में संस्कृत की ओर कम ध्यान देते हैं। यद्यपि संस्कृत की ललित पदावली और कोमल कल्पनाएँ उनके लिए मनोरंजन की यथेष्ट सामग्री प्रस्तुत करती है। डाक्टर भांडारकर को कभी यह शिकायत नहीं हुई। उनके व्याख्यान सदा तन्मयता के साथ सुने जाते थे। कुछ तो विषय पर उनका पाण्डित्यपूर्ण अधिकार और कुछ उनका सहज उत्साह तथा विनोदशीलता विद्यार्थियों के ध्यान चुंबक की तरह अपनी ओर खींच लेती थी। आपके विद्यार्थियों में विरले ही ऐसे निकलेंगे जिन्हें संस्कृत भाषा के माधुर्य का चस्का न पड़ गया हो।

लोकव्यवहार में डाक्टर भांडारकर का ढंग स्वाधीनता और खरेपन का था। चापलूसी से उन्होंने कभी अपनी जान को अपवित्र नहीं किया। और संभवतः कभी बाहरी बातों से दबकर अपने सिद्धान्त और व्यवहार में विरोध नहीं होने दिया। उनका जीवन प्रलोभनों से उतना ही निर्लिप्त रहा है, जितना मनुष्य के लिए संभव है। उनकी आत्मा को संभवतः किसी बात से इतनी चोट नहीं पहुँचती थी जितनी उनके चरित्र पर अनुचित आक्षेप होने से। उन्होंने कभी किसी का अनुग्रह प्राप्त करने की भावना नहीं की। ख्याति और सम्मान की आकांक्षा से सदा दूर रहे। यह वह कमजोरियाँ हैं जो कभी-कभी सर्वश्रेष्ठ व्यक्तियों को भी पथभ्रष्ट कर देती हैं। पर स्वाधीन और खरे स्वभाव पर इनका जादू नहीं चलता। फिर भी सरकार की कृपादृष्टि उनकी ओर अवश्य रही। वह उच्चतम सम्मान और उपाधियों जिनके लिए लोग तरसते रहते हैं, उन्हें बेमाँगे मिल गई। सी० आई० ई० तो पहले ही हो चुके थे। राज्याभिषेक-उत्सव के अवसर पर के० सी० एस० आई० की उपाधि भी प्रदान की गई। सरकार का कृपापात्र बनने के लिए हमें अपने आत्मसम्मान और न्यायप्रियता की हत्या करने की कदापि आवश्यकता नहीं, इसके लिए अगर प्रमाण की अपेक्षा हो तो आपका उदाहरण इस बात का पर्याप्त प्रमाण है। जो लोग ऐसा समझते हैं----और इनकी गिनती अनगिनत है-वे केवल