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कलम, तलवार और त्याग
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निकाला जिसके संपादक हकीम सिराजुल हक़ थे। इसमें भी सब लेख मौलाना के ही होते थे, पर यह रिसाला बहुत ही कम दिन जिया।

मौलाना की सभी रचनाएँ लोकप्रिय हुईं और इतनी हुई कि सर्वाधिकार संरक्षित होने पर भी कितने ही छापाखानो ने 'शहीदे वफ़ा’, ‘मलिकुल अजीज वर्जना’, ‘मंसूर मोहना, दुर्गेशनन्दिनी', 'दिलचस्प’, दिलकश', 'फिरदौसे बरी, फ्लोरा फ्लोरडा' को बार-बार छापकर लाभ उठाया। उन्होंने इतने ही पर सन्तोष नहीं किया, हुत्न का डाकू और 'दरबारे हरामपूर' को बदलकर, बिगाड़कर, आकार और मूल्य घटाकर, घटिया काग़ज़ पर छापकर लोगों को धोखा दिया और नफा कमाया। यो तो मौलाना को सभी रचनाएँ लोकप्रिय हुई, पर आरभ के उपन्यासों में मलिकुल अज़ीज वर्जना, मंसूर मोहना, दुर्गेशनन्दिनी, और शहीदे वफा को सर्वाधिक लोकप्रियता प्राप्त हुई और अन्तिम रचनाओं में ‘हुस्न की डाकू', 'शौक़ीन मलका, 'जूयाए हक़' और 'दरबार हरामपूर बेहद पसंद किये गये।

मौलाना को साहित्यसेवा का इतना उत्साह था कि आज एक भी आदमी उनकी बराबरी करनेवाला नहीं दिखाई देता। ७० साल की उम्र हुई, ५५ बरस तक उर्दू भाषा की सेवा में संलग्न रहे। अवध अखबार 'सहीफए नाम' और 'हमदर्दी में कम किया, 'महशर', ‘मुहज्जब', 'दिलगुदाज', 'इत्तेहाद, परदए असमत, अलइरफान'--- इन सब मासिको में लेख लिखे। इनमें से “दिलगुदाज' को ४६ बरस तक चलाया। इसके बाद उनकी रचनाओं की ओर देखिए तो उनकी गिनती १०० पुस्तकों से ऊपर हैं। ‘दिलगुदाज' के कितने ही लेख इतिहास के कई अध्याय और उपन्यासों के कुछ परिच्छेद पाठ्यक्रम में सम्मिलित हैं। कुछ उपन्यासों का अनुवाद दूसरी भाषाओं में भी हुआ है।

शेष वय में मौलाना का झुकाव अध्यात्म की ओर हुआ और उसका आरंभ पुराने इसलामी सन्तो की जीवनी से हुआ। सवानेह उम्री ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती, सवानेह अबूबकर शिबली और इसी प्रकार