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रेनाल्ड्स
 


था। चित्रकला के पुराने आचार्यों में उसे सच्ची श्रद्धा थी। राफाएल और माइकेल एंजेलो को वह किसी सिद्ध महात्मा या पैगम्बर से कम न मसझता था। कहता है-"चित्र में स्वाभाविकता का होना कलानिपुणता है और इसकी कमी, चाहे रंग भरने में हो या प्रकृत चित्र में, दोष है। रंग-विधान दो प्रकार का होता है। एक परिष्कृत, सुन्दर और सौम्य, दूसरा चटक, भड़कीला और आँखों में समा जानेवाला। कलाकार पहले प्रकार के रंग का व्यवहार करते हैं, व्यवसायी चित्रकार दूसरे प्रकार के रंग की। कुछ चित्रकारो का खयाल है कि ऐसी सादगी चित्र को उदास और अंबा दीपक बना देती है। पर यह कला का दोष है। इससे चित्र की शान्तिदायिनी शक्ति घट जाती है।"

रेनाल्ड्स को विद्वानों की संगति बड़ी प्रिय थी। शाम को चार बजते ही उसकी मेज सजा दी जाती थी और गुणोजन उसके इर्द-गिर्द जमा होने लगते थे। कवि अपनी कविता वहाँ सुनाते और काव्य-रसिकों से दाद पाते थे। जानसन इस मण्डली के नेता थे। गोल्डस्मिथ भी कभी-कभी आ निकलते और अपनी सरलता भरी बातों तथा बालोचित चेष्टाओं से मण्डली का मनोरंजन करते थे। धुरन्धर राजनीतिज्ञ और वक्ता एडमण्ड बर्क भी अकसर दिखाई देते थे, पर वह स्वभाव के अधिक विनोदप्रिय और चुलबुले न थे। रेनाल्ड्स विद्वानो का आदर ही न करता था, अकसर उनकी आर्थिक सहायता भी करता था। जिस व्यक्ति की बड़ाई जानसन और बर्क की लेखनी से निकली हो, उसके अमरत्व-लाभ मैं काल कब बाधक हो सकता है।

१७६० ई० में रायल एकेडमी की नींव पड़ी। इङ्गलैण्ड में यह चित्रकला की नियमित शिक्षा का पहला यत्न था। जिसकी आबोताब में कई सदियाँ गुजर जाने पर भी कोई अन्तर नहीं आया। रेनाल्ड्स इस विद्यालय को अन्तकाल तक अध्यक्ष रहा।

ऊपर कहा जा चुका है कि रेनाल्ड्स के हृदय में पोप कवि के लिए