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कलम , तलवार और त्याग
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धता बताये। पर मोतबरसिंह इतना दुर्बलचित्त और सिद्धांत-रहित व्यक्ति न था कि मंत्रित्व या एहसान के बदले में न्याय की हत्या करने को तैयार हो जाय। बड़े बेटे के रहते छोटे राज कुमार का युवराज-पद पानी कुल परम्परा के प्रतिकूल था, और यद्यपि वह महारानी को साफ जवाब न दे सके, पर इसका यत्न करने लगे कि सुरेन्द्र विक्रम के स्वभाव में ऐसा सुधार हो जाय जिससे महाराज को शासन-सूत्र, उनके हाथ में देने में आगा-पीछा करने की कोई गुंजाइश न रहे। पर खुद महाराज का खयाल उनकी ओर से अच्छा नहीं था। धीरे-धीरे महारानी को भी मालूम हो गया कि मोतबरसिंह से कोई आशा रखना बेकार है। अतः वह भी भीतर-भीतर उनके खून की प्यासी बन बैठी। बेचारे मोतबरसिंह अब कठिन समस्या में फंसे हुए थे। राजा भी दुश्मन, रानी भी दुश्मन। पर वह अपनी धुन के पक्के थे। एक ओर युवराज के शिक्षण और सुधार और दूसरी ओर महाराज को सब अधिकार दे देने को तैयार करने के यत्न में लगन के साथ लगे रहे। पर दोनों ही कठिन कार्य थे। क्रूरता जिस मनुष्य को स्वभाव बन गया हो, इसका सुधार दुस्साध्य है और महाराज जैसे अस्थिरचित्त, अदूरदर्शी और अधिकार-लोलुप व्यक्ति को हृदय परिवर्तन भी अनहोनी बात है; पर अन्त में उनके दोनों यत्न सफल हुए और १३ दिसम्बर, सम् ४४ को महाराज ने अपने सब अधिकार युवराज को सौंप दिये। और मोतबरसिंह ने यह घोषणा पढ़कर प्रजा को सुनाई।

धीरे-धीरे मौतबरसिंह का अधिकार और प्रभाव इतना बढ़ा कि राज्य के और सरदार घबड़ाने लगे। स्वेच्छाचारिता का अधिकार के साथ चोली-दामन का संबन्ध है। वह यहाँ भी प्रकट हुई। मोतबरसिंह अपने सामने किसी की भी नहीं सुनते थे। जंगबहादुर उनके सगे भानजे थे, इसलिए कभी-कभी दरबार में भी उनके विरोध की हिम्मत कर बैठते थे। नतीजा यह हुआ कि मामा-भानजे मैं तनातनी हो गई। एक बार किसी मामले में जंगबहादुर के चचेरे भाई देवीबहादुर