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कळम, तलवार और त्याग
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है और उसका घेरा लगभग २०० एकड़ है। यह आश्रम एक उदार धर्मानुरागिनी महिला की वदान्यता का स्मारक है।

स्वामीजी न्यूयार्क में थे कि पेरिस में विभिन्न धर्मों का संमेलन करने की योजना हुई, और आपका भी निमंत्रण मिला। इस समय तक आपने फ्रांसीसी भाषा में कभी भाषण न किया था। यह निमंत्रण पाते ही उसके अभ्यास में जुट गये। और अपने आत्मबल से दो महीने में ही उस पर इतना अधिकार प्राप्त कर लिया कि देखनेवाले दंग हो जाते। पेरिस में अपने हिन्दू-दर्शन पर दो व्याख्यान दिये, पर चूँकि यह केवल निवंध पढ़नेवालो का सम्मेलन था, और इसका उद्देश्य सत्य की खोज नहीं, किन्तु पेरिस की प्रदर्शनी की शोभा बढ़ाना था, इसलिए फ्रांस में स्वामीजी को सफलता न हुई।

अन्त में अत्यधिक श्रम के कारण स्वामीजी को शरीर बिल्कुल गिर गया। यों ही बहुत कमजोर हो रहे थे, पेरिस-संमेलन की तैयारी ने और भी कमजोर बना दिया। अमरीका, इंग्लैण्ड और फ्रांस की यात्रा करते हुए जब आप स्वदेश लौटे तो देह में हड्डियाँ भर रह गई थीं और इतनी शक्ति न थी कि सार्वजनिक सभाओं में भाषण कर सकें। डाक्टरों की कड़ी ताकीद थी कि आप कम-से-कम दो साल तक पूर्ण-विश्राम करें। पर जो हृदयं अपने देशवासियों के दुःख देखकर गल जाता हो, और जिसमें इनकी भलाई की धुन समाई हो, जिसमें यह लालसा हो कि आज की धन और थल से ही हिन्दू जाति फिर पूर्वकाल की सबल, समृद्ध और आत्मशालिनी आर्य जाति बने, उससे यह कब हो सकता था कि एक क्षण के लिए भी आराम कर सके। कलकत्ते पहुँचते ही कुछ ही दिन के बाद आप आसाम की ओर रवाना हुए और अनेक सभाओं में वेदान्त का प्रचार किया। कुछ तो स्वास्थ्य पहले से ही बिगड़ा हुआ था। कुछ उधर को जल वायु भी प्रतिकूल सिद्ध हुआ। आप फिर कलकत्ते लौटे। दो महीने सक हालत बहुत नाजुक रही। फिर बिल्कुल तन्दुरुस्त हो गये।

इन दिनों आप अक्सर कहा करते थे कि अब दुनिया में मेरा