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पृष्ठ:कवितावली.pdf/८६

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लङ्काकाण्ड

अर्थ—जब पत्थर और लकड़ो (वृक्षों) को बाहन बनाकर अथवा जब पत्थर वनवाहन (नौका) हो गये तो बन्दर राम की जय करते हुए पार उतर आये। हे तुलसी! सब शैल और शिला लिये हुए ऐसे शोभित थे मानो समुद्र के पानी का बल बढ़ रहा अर्थात् समुद्र में ज्वार आ गया अथवा उनका बल ऐसा बढ़ा जैसे समुद्र का पानी। कोप करके बन्दर कहते हैं कि राम की आज्ञा हो तो खेल ही खेल में अर्थात् विना प्रयास कूदकर गढ़ पर चढ़ जायँ और चतुरङ्ग सेना को क्षण भर में मारकर लड़ाई में रावण से राढ़ (हठी व बली) के अथवा रावण को राँड़ (निस्सहाय) करके उसके हाड़ों (हड्डियों) को गढ़ डालें।

घनाक्षरी
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बिपुल विसाल बिकराल कपि भालु मानौ
काल बहु वेष धरे धाये किये करषा।
लिये सिला सैल, साल लाल औ तमाल तोरि
तोपैं तोयनिधि, सुर को समाज हरषा॥
डगे दिग-कुंजर, कमठ कोल कलमले,
डोले धराधर-धारि, धराधर धरषा।
तुलसी तमकि चलैं, राघौ की सपथ करैं,
को करै अटक कपि-कटक अमरषा॥

अर्थ—अत्यन्त बड़े और विकराल कपि व भालु क्रोध करके दौड़े माना अनेक रूप धारण किये काल हैं और पर्वत और शिला उखाड़कर और साल, ताड़ और तमाल के वृक्ष तोड़कर समुद्र को पाट दिया, सेतु बाँध दिया, जिसे देखकर देवगण अति प्रसन्न हुए। दिग्गज डिग गये, कछुवा, सूकर हिलने लगे, पर्वतों की पाँतिसहित पृथ्वी हिलने लगी, धरा (पृथ्वी) को धारण करनेवाले (शेष) धरषा गये (दंब वा घबरा गये)। हे तुलसी! वानर तेज़ी से चलते थे और रामचन्द्र की क़सम खाते थे। जब बन्दरों की सेना क्रोधित हुई तब उसे कौन रोक सकता था?

शब्दार्थ— करखा= क्रोध। तोप= पाट देना। तोयनिधि= समुद्र। धराधर= शेष, पर्वत। अमरषे= क्रोधित हुए।