सामग्री पर जाएँ

पृष्ठ:कविता-कौमुदी 1.pdf/३५१

विकिस्रोत से
यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।
२९६
कविता-कौमुदी
 

जो रण ऊपर जाइये दहिने स्वर परकाश।
जीत होय हारै नहीं करै शत्रु को नाश॥४५॥
सूक्षम भोजन कीजिये रहिये ना पड़ सोव।
जल थोरा सा पीजिये बहुत बोल मत खोय॥४६॥
पावक सानी वायु है घरती और अकाश।
पाँच तत्व के कोट में आय कियो तैं वास॥४७॥
सत गुरु मेरा सुग्मा करैं शब्द की चोट।
मारै गोला प्रेम का ढहै भरम का कोट॥४८॥
मैं मिरगा गुरु पारधी शब्द लगायो बान।
चरनदास घायल गिरे तन मन बींधे प्रान॥४९॥
धन नगरी धन देस है धन पुर पट्टन गाँव।
जहँ साधू जन उपजियो ताकी बलि बलि जाँव॥५०॥


 

सहजोबाई

हजोबाई राजपूताना के एक प्रतिष्ठित ढूसर कुल की स्त्री थीं। इन्होंने अपने विषय में एक स्थान पर लिखा है—

हरि प्रसाद की सुता, नाम है सहजाबाई।
ढूसर कुल में जन्म, सदा गुरु चरन सहाई॥

इनके जन्म काल का ठीक ठीक पता नहीं चलता। परन्तु इन्होंने अपने गुरु साधु चरनदासजी का जन्म समय भादव सुदी ३ मङ्गलबार सं॰ १७६० विक्रमीय लिखा है। इससे केवल यह माना जा सकता है कि उन्हीं दिनों के आस पास इनका भी जीवन काल है।

सहजोबाई की कविता से प्रकट होता है कि उनमें बड़ी