सरसिज बिनु सर सरबिनु सर सिज की सरसिज बिनु सूरे।
जौवन बिनु तन तनु बिनु जौवन की जीवन पिय दरे॥
सखि हे मोर बड़ देव विरोधी॥७॥
माधव कत तोर करब बड़ाई।
उपमा तोहर हम ककरा कहब कहितहुँ अधिक लजाइ॥
जो श्रीखंड सौरभ अति दुर्लभ तौं पुनि काठ कठोर।
जौं जगदीश निशाकर तौं पुन एकहि पक्ष इजोर॥
मनि समान अओरो नसि दूसर तनिकहुं पाथर नामें।
कनक कदलि छोट लज्जित मैं रहु की कहु ठामहि ठामें॥
तोहर सरिस एक तोह माधव मन होइछ अनुमाने।
सज्जन जन सों नेह कठिन थिक कवि विद्यापति भाने॥८॥
सखि कि पुछसि अनुभव मोय।
सेही परत अनुराग बखानइत तिले तिले नूतुन होइ॥
जनम अवधि हम रूप निहारल नयन न तिरपित भेल।
सेहो मधुर बोल श्रवणहि सुनल श्रुति पथे परस न गेल॥
कत मधु जामिनअ रभसे गमाओल न बुझल कैसन केल।
लाख लाख जुग हिअ हिअ राखल तइओ हिआ जुड़न न गेल॥
कत विदगध जन रस अनुगमन अनुभव काहु न पेख।
विद्यापति कह प्राण जुड़ाइत लाखवे न मिलल एक॥९॥
ब्रह्म कमण्डल वास सुवासिनि सागर नागर गृह वाले,
पातक महिष विदारण कारण धृत करवाल वीचि माले,
जय गंगे, जय गंगे, शरणागत भय भंगे॥१०॥
पिया मोर बालक हम तरुणी,
कोन तप चुकालौंह भैलौंह जननी।