नील वसन तन घेरलि सजनी सिरै लेल चिकुर सँभारि।
तापर भमर पिवय रस सजनी बैसल पंख पसारि॥
केहरि सम कटि गुन अछि सजनी लोचन अंबुज धारि।
विद्यापति यह गाओल सजनी गुन पाओलि अवधारि॥१६॥
कबीर साहब
संयुक्त प्रांत में शायद ही कोई ऐसा हिन्दू हो जो कबीर साहब को न जानता होगा। कबीर साहब के भजन, मंदिरों में और सत्संग के अवसरों पर गाये जाते हैं। उनकी साखियाँ प्रायः कहावतों का काम दिया करती हैं।
कबीर साहब एक पंथ के प्रवर्त्तक थे, जिसे कबीर पंथ कहते हैं। कबीर पंथियों में निम्न श्रेणी के लोग अधिकांश पाए जाते हैं। उनमें से कुछ तो साधू हैं जो गाँवों में कुटी बना कर रहते हैं और कुछ गृहस्थ हैं। कबीरपंथी साधू सिर पर नोकदार पीले रंग की टोपी पहनते हैं।
कबीर साहब कौन थे? कहाँ और किस समय में व उत्पन्न हुये? उनका असली नाम क्या था? बचपन में वो कौन धर्मावलंबी थे? उनका विवाह हुआ था या नहीं? और वे कितने समय तक जीवित रहे? इन बातों में बड़ा मतभेद हैं। कबीर साहब की जीवनी लिखने वाले भिन्न भिन्न बातें बतलाते हैं। उनमें सत्य का अंश कितना है, इसका पता लगाना सहज नहीं है। "कबीर कसौटी" में कबीर साहब का जन्म संवत् १४५५ वि॰ में और मरण १५७५ वि॰ में होना लिखा है। कबीर पंथी लोग उनकी उम्र तीन सौ वर्ष की