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पृष्ठ:कविता-कौमुदी 1.pdf/८०

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कबीर साहब
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बतलाते हैं। उनके कथनानुसार कबीर साहब का जन्म १२०५ वि॰ में और मरण १५०५ वि॰ में हुआ है। इनमें से किसकी बात सत्य है? इसका निर्णय करना बड़ी खोज का काम है। कबीर पंथ के विद्वानों की राय में कबीर साहब का जन्म संवत् १४५५ ही सत्य कहा जाता है।

कबीर साहब ने अपने को जुलाहा लिखा है। एक जगह वे कहते हैं—

तू ब्राह्मण मैं काशी का जुलहा बहु मोर गियाना।

(आदि ग्रंथ)

इससे अब इस बात में तो कुछ संदेह रह ही नहीं जाता कि कबीर साहब जुलाहे थे। परन्तु वे जन्म के जुलाई नहीं थे, यह कहावतों से मालूम होता है।

कहा जाता है कि संवत् १४५५ की ज्येष्ठ शुक्ला पूर्णिमा को एक ब्राह्मण की विधवा कन्या के पेट से एक पुत्र पैदा हुआ। लोक लज्जावश उसने बालक को लहर तालाब (काशी) के किनारे फेंक दिया। संयोग से नीरू जुलाहा अपनी स्त्री नीमा के साथ उसी राह से आरहा था। उसने उस अनाथ बच्चे को घर लाकर पाला। पीछे वही कबीर नाम से विख्यात हुआ। कबीर साहब बालकपन से ही बड़े धर्मपरायण थे। जब उनको सुध बुध हो गई तब वे तिलक लगा कर राम राम करते थे। एक जुलाहे के घर में रहकर तिलक लगाना और राम राम जपना असंभव सा प्रतीत होता है? परन्तु संगति का प्रभाव बड़ा विचित्र होता है। वह असंभव को भी संभव कर देता है।

ऐसी कहावत है कि कबीर साहब स्वामी रामानंद के