कबीर साहब की कविता में बड़ी शिक्षा भरी है। एक एक पद से उनकी सत्य-निष्ठा प्रकट होती है। उन्होंने जो कहा है, प्रायः सभी एक से एक बढ़ कर है। हम ने उन्हीं में से कुछ साखी और भजन चुन लिये हैं। हमें कबीर साहब की साखी में बड़ा आनन्द मिलता है। बातें तो छोटी सी हैं, परन्तु उनमें अगाध ज्ञान भरा हुआ है।
हम यहाँ कबीर साहब की कुछ साखियाँ और भजन उद्धृत करते हैं:—
साखी
गुरु गोविंद दोऊ खड़े काके लागू पाँय।
बलिहारी गुरु आपने जिन गोविंद दिया बताय॥१॥
यह तन विष की बेलरी गुरु अमृत की खान।
सीस दिये जो गुरु मिलैं तौ भी सस्ता जान॥२॥
बहे बहाये जात थे लोक वेद के साथ।
पैड़ा में सत गुरु मिले दीपक दीन्हा हाथ॥३॥
ऐसा कोई ना मिला सत्त नाम का मीत।
तन मन सौंपे मिरग ज्यौं सुनै वधिक का गीत॥४॥
सतगुरु साचा सुरमा नख सिख मारा पूर।
बाहर घाव न दीसई भीतर चकनाचूर॥५॥
सुख के माथे सिलि परै (जो) नाम हृदय से जाय।
बलिहारी वा दुक्ख की पल पल नाम रटाय॥६॥
लेने को सतमान है देने को अन दान।
तरने को आधीनता बूड़न को अभिमान॥७॥
दुःख में सुमिरन सब करै सुख में करै न कोय।
जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे होय॥८॥