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पृष्ठ:कविता-कौमुदी 1.pdf/८६

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कबीर साहब
३१
 

सुमिरन की सुधि यों करै ज्यों गागर पनिहार।
हालै डोलै सुरति में कहै कबीर विचार॥९॥
माला तो कर में फिरैं जीभ फिरै मुख माहि।
मनुवाँ तो दहुँ दिस फिरैं यह तो सुमिरन नाहि॥१०॥
गगन मंडल के बीच में जहाँ सोहंगम डोरि।
सबद अनाहद होता हैं सुरत लगी तहँ मोरि॥११॥
कबीर गर्ब न कीजिए काल गहे कर केस।
ना जानौं कित मारि है क्या घर या परदेस॥१२॥
हाड़ जरै ज्यों लाकड़ी केस जरै ज्यों घास।
सब जग जरता देखि कर भये कबीर उदास॥१३॥
झूठे सुख को सुख कहैं मानत है मन मोद
जगत चबेना काल का कुछ सुख में कुछ गोद॥१४॥
पानी केरा बुद बुदा अस मानुष की जात।
देखतही छिपि जायगी ज्यों तारा परभात॥१५॥
रात गँवाई सोय करि दिवस गंवायों खाय।
हीरा जन्म अमोल था कौड़ी बदले जाय॥१६॥
आज कहै कल्ह भजूँगा काल कहै फिर काल।
आज कालके करते ही औसर झांसी चाल॥१७॥
आछे दिन पाछे गये गुरु से किया न हेत।
अब पछतावा क्या करै चिड़ियाँ चुग गई खेत॥१८॥
काल करै सो आज कर आज करैं सो अब्ब।
पलमें परलै होयगी बहुरि करैगा कब्ब॥१९॥
कबीर नौबत आपनी दिन दस लेहु बजाय।
यह पुर पट्टन यह गली बहुरि न देखौं आय॥२०॥
पाँचों नौबत बाजती होत छत्तीसों राग।
सो मन्दिर खाली पड़ा बैठन लागे काग॥२१॥