कहा चुनावै मेड़ियाँ लम्बी भीति उसारि।
घर तो साढ़े तीन हथ घना तो पौने चारि॥२२॥
माटी कहै कुम्हार को तू क्या रूँदै मोहिं।
इक दिन ऐसा होइगा मैं रूँदूँगी तोहि॥२३॥
यह तन काँचा कुम्भ है लिये फिरै था साथ।
टपका लागा फूटिया कछु नहिँ आया हाथ॥२४॥
आये हैं सो जाँयगे राजा रंक फ़कीर॥
एक सिंघासन चढ़ि चले एक बंधे जंजीर॥२५॥
आसपास जोधा खड़े सभी बजावैं गाल॥
मंझ महल से लै चला ऐसा काल कराल॥२६॥
या दुनिया में आय के छाड़ि देइ तू ऐंठ।
लेना होय सो लेइ ले उठी जात है पैंठ॥२७॥
कबीर आप ठगाइये और न ठगिये कोय।
आप ठगे सुख ऊपजै और ठगे दुख होय॥२८॥
ऐसी गति संसार की ज्यों गाड़र की ठाट।
एक पड़ा जेहि गाड़ में सबै जाहिं तेहि बाट॥२९॥
तू मत जानै बावरे मेरा है सब कोय॥
पिंड प्रान से बैधि रहा सो अपना नहि होय॥३०॥
इक दिन ऐसा होयगा कोउ काहू का नाहिं।
घर की नारी को कहै तन की नारी जाहि॥३१॥
नाम भजो तो अब भजो बहुरि भजोगे कब्ब।
हरियर हरियर रुखड़े ईंधन हो गये सब्ब॥३२॥
माली आवत देखि कै कलियाँ करी पुकार।
फूली फूली चुनि लिये कालि हमारी बार॥३३॥
हम जानैं थे खाहिंगे बहुत जमी बहु माल।
ज्यों का त्यों ही रहि गया पकरि लै गया काल॥२४॥
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कविता-कौमुदी