पृष्ठ:कवि-प्रिया.djvu/१३७

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( १२२ । सेनापति को स्वामिभक्त, अथक परिश्रमी, बुद्धिमान, निडर, आलस्य रहित, लोक-प्रिय, यशस्वी और युद्ध मे सुखपूर्वक न जीता जानेवाला होना चाहिए। उदाहरण सवैया छांडिदियो सब आरस, पारस, केशव स्वारथ साथ समूरो । साहस सिध प्रसिद्ध सदा जलहू थलहू बल बिक्रम पूरो ।। सोहिए एक अनेकनि माह, अनेकन एक बिना रणरूरो। राजति है तेहि राजको राज सुजाकी चमूमें चमूपतिशूरो ॥१४॥ 'केशवदास' कहते है कि जिसने सब आलस्य छोड दिया हो और समस्त स्वार्थ का परित्याग कर दिया हो । जो साहस का समुद्र अर्थात् बडा साहसी हो तथा जल-थल सभी स्थानो मे पूरा बल-विक्रम दिखलाने वाला हो । जो अनेक मनुष्यो मे एक ही वीर हो और उस एक के बिना अनेक वीर भी सुन्दर युद्ध न कर सकें। जिसके राज्य मे ऐसा शूर सेना पति हो उसी राजा का राज्य सुशोभित होता है। दूतवर्णन दोहा तेज बढ़े निज राज को, अरिउर उपजै छोभ । इगित जानहि समयगुण, बरणहुँ दूत प्रलोभ ॥१५॥ जो दूत-'अपने राज्य का तेज बढे और बैरियो के हृदयो मे दु.ख हो' इसका विचार रखे, संकेत को समझनेवाला हो, समयानुसार गुण अवगुण का पारखी तथा लालच रहित हो, उसी का वर्णन करना चाहिए । उदाहरण कवित्त स्वारथ रहित, हितसहित, विहितमति, ____ काम, क्रोध, लोभ, मोह छोभ मदहीने है। मीत हू अमीत पहिचानिवे को, देशकाल, बुद्धि बल जानिबे को परम प्रवीने हैं।