पृष्ठ:कवि-प्रिया.djvu/१७१

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( १५६ ) (पार्वतीजी की सखी उन्हे समझाती हुई कहती है कि ) हे गौरी । कौन जाने तुम्हारे प्राणनाथ (शिवजी ) के अग पर क्या बीते, इसलिए तुम किसी प्रकार भी टेढी भौंहे न करो अर्थात मान न दिखलाओ। [ इसमे 'को जानै ह जाय कह' भविष्य सूचक क्रिया है, अत यह भावी प्रतिषेध है ] वर्तमान प्रतिषेध कोविद । कपट नकार शर, लगत न तजहु उछाह । प्रतिपल नूतन नेहको, पहिरै नाह सनाह ॥५॥ नायक को समझाती हुई सखी कहती है कि हे कोविद | इन न कार ( नहीं, नहीं करने के ) वाणो के लगने से अपना उत्साह न छोडो । क्योकि नाह (नायक) तो प्रतिपल वयेस्नेह का कवच पहनते हैं। [ इसमे 'न तजहु' बर्तमान कालिक क्रिया है, अतः यह वर्तमान प्रतिषेध है ] आक्षेप के मेद पेम, अधीरज, धीरजह, सशय, मरण, पकास । आशिष, धर्म, उपाय कहि, शिक्षा केशवदास ॥६॥ 'केशवदास' कहते है कि ( आक्षेप मे प्रतिषेध ( रोक ) का कार्य ) प्रेम, अधैय, धैर्य, सशय, मरण, आशिष, धर्म, उपाय और शिक्षा द्वारा किया जाता है। १-प्रेमाक्षेप दोहा प्रेम बखानतही जहाँ, उपजत कारजबाधु । कहत प्रेम आक्षेप तह, तासों केशव साधु ॥७॥ 'केशवदास' कहते है कि प्रेम का वर्णन करते ही, कार्य मे बाधा उत्पन्न हो जाय, वहाँ साधु (विद्वान, लोग 'प्रेमाक्षेप' बतलाते है ।