पृष्ठ:कवि-प्रिया.djvu/१७७

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( १६२ ) हे राजन | यह बात कुछ मै ही नहीं कहती, वेद पुराण सब बराबर यही कहते चले आये है कि अपने कार्य साधन मे ही व्यक्ति का परमहित होता है। ७-धर्माक्षेप दोहा राखत अपने धर्म को, जहँ कारज रहिजाय । धर्माक्षेप सदा यहै, बरणत सब कविराय ॥१६॥ जहाँ अपने धर्म ( कर्तव्य ) का पालन करने से, दूसरे का काम रुक जाय, वहाँ सब कवि, लोग उसे धर्माक्षेप कहते हैं । उदाहरण कवित्त जो हौ कहौ 'रहिये' तो प्रभुता प्रगट होत, . 'चलन कही तो हित हानि, नाहि सहनो। 'भावे सो करहु, तो उदास भाव प्राणनाथ, साथ लै चलहु' कैसे लोक लाज बहनो। 'केशोराय' की सौ तुम सुनहु छवीले लाल, . चले ही बनत जो पै नाही आज रहनो। तैसियै सिखाओ सीख, तुमही सुजान पिय, तुमहि चलत मोहि जैसे कुछ कहनो ॥२०॥ (एक स्त्री अपने पति से चलते समय कहती है कि ) आपके चलते समय यदि मै कहूँ कि 'न जाइए यही रहिए' तो इसमे मेरी प्रभुता प्रकट होती है । और यदि कहूँ कि 'आपको जैसा अच्छा लगे वैसा कीजिए' तो हे प्राणनाथ | इसमे उदासीनता का भाव प्रकट होता है। यदि कहूँ कि 'अपने साथ ले चलो, तो लोक-लज्जा का कैसे निर्वाह होगा ? हे छबीले लाल । यदि आज आपको जाना ही है और यहाँ नहीं रहना है तो, आप ही मुझे सिखाइये कि 'आपके चलते