पृष्ठ:कवि-प्रिया.djvu/२००

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जहाँ कपट बिलकुल दूर हो जाय और पूर्णरूप से मगल कामना के भाव उत्पन्न हो, उसको (केशवदास कहते है कि) सब लोग उत्तम 'प्रेमा- लकार' कहते हैं। उदाहरण ( सवैया ) कछु बात सुनै सपनेहू वियोग की, होन चहै दुई टूक हियो । मिलिखेलिये जा सँगबालकतै, कहि तासों अबोलो क्यों जातकियो। कहिये कह केशव नैननसो, बिन काजहि पावकपुंज पियो । सखि तू बरजै अरु लोग हँसै सब, काहेको प्रेम को नेमलियो ॥२८॥ _ वियोग की तनिक सी भी चर्चा सपने मे भी सुनने पर, मेर। हृदय दो टुकडे होना चाहता है। जिसके साथ बालकपन से मिल-जुल कर खेलती रही, उससे चुप होकर रहना कैसे बन सकता है। ( केशवदास सखी की ओर से कहते है कि , इन आँखो को में क्या कहूँ जो ( उन्हे बिना देखे ) आग सी पिये रहते है अर्थात् जलते रहते है । हे सखी ! इधर तू तो मना करती है ( कि उससे मत बोला कर ) और उधर लोग हॅसते है और कहते है कि फिर तूने प्रेम का नियम क्यो लिया। उदाहरण दो अर्थ का श्लेष ___ कवित्त धरत धरणि, ईश शीश चरणोदकनि, ____गावत चतुर मुख सब सुख दानिये । कोमल अमल पद कमला कर कमल, लालित, बलित गुण, क्यों न उर आनिये । हिरणकशिपु दानकारी प्रहलाद हित, द्विज पद उरधारी वेदन बखानिये। 'केशोदास' दारिद दुरद के बिदारबे को, एकै नरसिह के अमरसिंह जानिये ॥३०॥