पृष्ठ:कवि-प्रिया.djvu/२२३

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( २०६ ) वरदानो द्वारा मुझे हानि पहुचाने को उद्यत प्रतीत होते है उसी क्रोवा वेश मे वह कह रहे है कि ] ____बारहो सूर्य को अदृष्य करके, या आठो वसुओ को नष्टकर डालूगा। रुद्रो को समुद्र मे डुबाकर, गन्धर्वो को पशु के समान बलि चढा दूंगा। वरुण सहित कुबेर और इन्द्र को पकडकर बलि को समर्पित कर दूंगा। विद्याधरो का अस्तित्व मिटा दूंगा और सिद्धो को सिद्धि- रहित कर दूंगा। आदिति को दिति की दासी बनाकर छोडूगा । वायु, अग्नि और जल सब मिट जायेंगे। हे सूरज ( सूर्यपुत्र-सुग्रीव )। सुनो, सूर्य के उदय होते ही मैं सारे ससार को, अपने बल से देव-रहित कर डालूंगा। [ इसमे 'क्रोध' स्थायी भाव है, इसलिए रौद्र रसवत अलकार है ] करुणा रसवत उदाहरण सवैया दूरिते दुन्दुभी दीह सुनी न गुनी जनु पुँज की गुंजन गाढ़ी ॥ तोरन तूर न ताल बजै, बरह्मावत भाट न गावत ढाढ़ी । विष न मंगल मन्त्र पढ़े, अरु देखै न वारवधू ढिग ठाढ़ी। केशव तात के गात, उतारति आरति मातहि आरति बाढ़ी ॥५७।। ( जिस समय श्री भरत जी अपनी ननिहाल से लौटे, उस समय उन्होने देखा कि ) न तो दूर से दुन्दुभी की ध्वनि सुनाई पडी और गुरणी गायको का ही शब्द सुनाई पडा। न तो रण सजा हुआ देखा, न तुरही और मँजीरे बजाते हुए सुने और न भाटो ने विरुदावली गाई तथा न ढाढी गाते हुए मिले । न ब्राह्मण मगल मत्र पढते देखे और न वेश्याएँ द्वार पर खडी हुई पाई । 'केशवदास' कहते हैं कि