पृष्ठ:कवि-प्रिया.djvu/२९३

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( २७४ ) 'केशौदास' सबिलास गीत रग रंगनि, कुरंग अगनानि हू के अंगनानि गाइये। सीता जी की नयन-निकाई हम ही मे हैसु, झूठी है नलिन, खजरीट हू मे पाइये ॥२८॥ श्री सीताजी के नेत्रो की शोभा हम ही मे है यह अभिमान मछ- लियो के मन मे रहता है, सो मै सब रहस्य जानती हूँ कैसे न बतलाऊँ । उधर कामदेव के बाणो को भी इस बात का बडा अभिमान हो गया है, सो कैसे बतलाया जाय। 'केशवदास' ( सखी की ओर से ) कहते है कि उधर हिरणियो के । नेत्रो की शोभा के ) गीत भी अनेक प्रकार से आगन-आगन अर्थात् घर-घर मे गाये जाते है। सब लोम जो यह धारणा बनाये हुये हैं कि 'श्री सीताजी के नेत्रो की शोभा हमहीं मे है' सो झूठ है । वैसी शोभा तो कमलो और खजनो मे भी पाई जाती है। १३-श्लेषोपमा दोहा जहाँ स्वरूप प्रयोगिये, शब्द एकही अर्थ । केशव तासों कहत है, श्लेषोपमा समर्थ ॥२६॥ 'केशवदास' कहते है कि जहाँ ऐसे शब्दो का प्रयोग किया जाय जो उपमेय और उपमान मे समान अर्थ मे लग सके, वहा उसे समर्थ लोग (विद्वान ) श्लेषोपमा कहते है। उदाहरण कक्त्ति सगुन, सरस, सब अंग राग रंजित है, सुनहु सुभाग बड़े भाग बाग पाइये।